नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों के धर्मांतरण कानूनों की संवैधानिक वैधता पर फैसला करने का ऐलान किया है।

कोर्ट ने हाई कोर्टों में लंबित सभी संबंधित मामलों को खुद अपने पास स्थानांतरित कर लिया है। यह फैसला अंतरधार्मिक विवाहों में उत्पीड़न और ‘लव जिहाद’ जैसे कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया है।

मुख्य न्यायाधीश गवई और न्यायमूर्ति विनोद चंद्रन की बेंच ने सोमवार को यह निर्देश दिया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड जैसे राज्यों को चार सप्ताह के अंदर जवाब देने का समय दिया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये कानून धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं और अंतरधार्मिक जोड़ों को परेशान करने का हथियार बन गए हैं।सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस’ नामक एनजीओ ने याचिका दायर की थी, जिसमें इन कानूनों को रोकने की मांग की गई। वहीं, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने छह हाई कोर्टों में लंबित 21 मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की गुजारिश की। कोर्ट ने राज्यों से पूछा है कि ये कानून संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का पालन करते हैं या नहीं।वकीलों का मानना है कि यह फैसला धार्मिक रूपांतरण पर पूरे देश में बहस को नई दिशा देगा। कई विशेषज्ञों ने इसे सकारात्मक कदम बताया, क्योंकि हाई कोर्टों में अलग-अलग फैसलों से भ्रम की स्थिति बन रही थी। कोर्ट अगली सुनवाई में इन कानूनों की वैधता पर विस्तार से विचार करेगा।

यह मामला धार्मिक सद्भाव और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन बनाने का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

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