कथाकार मनोज रूपड़ा के अपमान को लेकर लेखकों, पत्रकारों और शिक्षाविदों ने खड़े किए कई सवाल

बिलासपुरगुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय साहित्यिक–शैक्षणिक कार्यक्रम के दौरान कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ हुए अपमानजनक बर्ताक को लेकर विरोध अब छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहा। इस घटना पर देश के विभिन्न हिस्सों से साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अधिकांश प्रतिक्रियाओं में कुलपति प्रो. आलोक चक्रवाल के आचरण की निंदा करते हुए इसे साहित्य और अकादमिक गरिमा के खिलाफ बताया गया है।

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार सतीश जायसवाल ने कहा कि आमंत्रित साहित्यकार का मंच से अपमान किया जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि मनोज रूपड़ा जैसे वरिष्ठ कथाकार को जिस तरह कार्यक्रम छोड़ने को कहा गया, उसने विश्वविद्यालय की छवि को गहरी ठेस पहुंचाई है। उन्होंने साहित्य अकादमी के किसी जिम्मेदार अधिकारी की अनुपस्थिति पर भी सवाल उठाए और इसे लेखकों के सम्मान के प्रति उपेक्षा बताया।

सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला ने इस घटना को असहनीय बताते हुए कहा कि जब विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी स्वयं किसी लेखक को आमंत्रित करती हैं, तो फिर सार्वजनिक रूप से उसका अपमान करना पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में विश्वविद्यालय के शिक्षकों की चुप्पी भी चिंता का विषय है।

नई दिल्ली के पत्रकार शकील अख्तर ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस घटना ने विश्वविद्यालयों में घटते संवाद और लेखकों के प्रति सम्मान की कमी को उजागर किया है। उन्होंने इसे पूरे हिंदी साहित्य जगत के लिए अपमानजनक बताया और कहा कि मनोज रूपड़ा ने कार्यक्रम छोड़कर अपने आत्मसम्मान की रक्षा की।

लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर रविकांत ने भी इस घटना की निंदा करते हुए कुलपति से सार्वजनिक माफी की मांग की। उन्होंने कहा कि साहित्य के विद्यार्थियों और शिक्षकों को ऐसे मामलों में स्पष्ट पक्ष लेना चाहिए।

दिल्ली के राजनीतिक विश्लेषक डॉ. लक्ष्मण यादव और भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार डॉ. राकेश पाठक ने इसे विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पतन और संवेदनहीनता का उदाहरण बताया। उनका कहना है कि यह केवल एक कार्यक्रम का विवाद नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला है।

लगातार सामने आ रही इन प्रतिक्रियाओं के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका और साहित्य अकादमी की चुप्पी पर भी बहस तेज हो गई है। अब यह मामला केवल एक व्यक्ति या कार्यक्रम तक सीमित न रहकर, शैक्षणिक संस्थानों में साहित्य और अभिव्यक्ति के सम्मान से जुड़ा व्यापक मुद्दा बनता जा रहा है। 

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