कोविड महामारी के दौरान महिला की मौत पर बीमा दावे को किया था खारिज

बिलासपुर। बीमा दावा खारिज करने के एक मामले में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर ने उपभोक्ता के पक्ष में अहम फैसला सुनाया है। आयोग ने मैक्स लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को बीमा राशि के रूप में 1 करोड़ रुपये, उस पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, तथा मानसिक प्रताड़ना और वाद व्यय के लिए अलग से 2 लाख रुपये अदा करने का आदेश दिया है।

पत्नी के नाम लिया था 1 करोड़ का बीमा

बिलासपुर निवासी कौशल प्रसाद कौशिक ने मई 2020 में अपनी पत्नी शैल कौशिक के नाम से मैक्स लाइफ का “प्लैटिनम वेल्थ प्लान” लिया था। इस पॉलिसी की बीमित राशि 1 करोड़ रुपये थी। पॉलिसी जारी करने से पहले बीमा कंपनी ने अपने स्तर पर सभी जरूरी मेडिकल जांच कराई थी।

कोविड संक्रमण के बाद हुई मृत्यु

सितंबर 2020 में शैल कौशिक कोविड-19 से संक्रमित हो गईं। इलाज के दौरान 11 अक्टूबर 2020 को उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद पति कौशल प्रसाद कौशिक ने बीमा दावा प्रस्तुत किया, लेकिन बीमा कंपनी ने दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मृतका को पहले से गंभीर बीमारी थी, जिसे पॉलिसी लेते समय छिपाया गया था। कंपनी ने बीमा राशि देने के बजाय केवल प्रीमियम लौटा दिया।

बीमा कंपनी के तर्क खारिज

मामले की सुनवाई आयोग के अध्यक्ष आनंद कुमार सिंघल, सदस्य पूर्णिमा सिंह और आलोक कुमार पांडेय की पीठ में हुई। आयोग ने रिकॉर्ड और मेडिकल दस्तावेजों की जांच के बाद माना कि पॉलिसी जारी करने से पहले बीमा कंपनी ने स्वयं महिला की पूरी मेडिकल जांच कराई थी, जिसमें वह स्वस्थ पाई गई थीं।

बीमा कंपनी ने यह दावा किया कि बीमित महिला को वर्ष 2016 से हृदय रोग था, लेकिन आयोग ने कहा कि कंपनी इस बात का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकी कि बीमारी पॉलिसी से पहले मौजूद थी, उसका इलाज चल रहा था या उसे जानबूझकर छिपाया गया था।

सेवा में कमी मानी गई

आयोग ने स्पष्ट कहा कि केवल अनुमान या पुराने रिकॉर्ड के आधार पर बीमा दावा खारिज करना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत सेवा में कमी है। जब बीमा कंपनी खुद मेडिकल जांच कराकर पॉलिसी जारी करती है, तो बाद में बिना ठोस सबूत के दावा नकारना अनुचित है।

उपभोक्ता को पूरी राशि देने के निर्देश

इन तथ्यों के आधार पर आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह उपभोक्ता को 1 करोड़ रुपये की बीमा राशि 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करे। साथ ही मानसिक पीड़ा और कानूनी खर्च के लिए 2 लाख रुपये अलग से देने का भी आदेश दिया गया।

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