नियमों की अनदेखी; 754 सीधे प्रभावित गांवों तक नहीं पहुंचा लाभ, गैर-पात्र कामों पर करोड़ों खर्च

रायपुर। छत्तीसगढ़ में खनन से प्रभावित लोगों और क्षेत्रों के विकास के लिए बनाए गए जिला खनिज न्यास (DMF) फंड के इस्तेमाल को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट में प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY) के क्रियान्वयन में नियमों से विचलन, कमजोर योजना, अपात्र कार्यों पर खर्च, टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता, अधूरे कामों पर निष्फल व्यय और पारदर्शिता की कमी सामने आने की बात कही गई है।

CAG के अनुसार वर्ष 2015-16 से 2023-24 के बीच छत्तीसगढ़ के जिला खनिज न्यासों को कुल ₹13,101 करोड़ प्राप्त हुए। इनमें से करीब ₹10,253 करोड़ यानी 78 प्रतिशत राशि खर्च की गई। लेकिन ऑडिट में पाया गया कि जिस आबादी और गांवों के कल्याण को इस फंड का मूल उद्देश्य बनाया गया था, वहां तक इसका लाभ समान रूप से नहीं पहुंचा।

रिपोर्ट के मुताबिक नियमों में बदलाव और प्रभावित लोगों की परिभाषा को व्यापक किए जाने से खनन प्रभावित समुदायों के लिए निर्धारित लाभ का दायरा इतना बढ़ गया कि फंड का इस्तेमाल व्यापक सामुदायिक योजनाओं में होने लगा। परिणामस्वरूप बड़ी राशि ऐसे कामों और योजनाओं पर खर्च हुई, जिनका सीधे खनन प्रभावित लोगों से संबंध स्पष्ट नहीं था।

प्रभावित लोगों की परिभाषा बदली, मुफ्त सामान बांटने पर ₹709 करोड़

PMKKKY का मूल उद्देश्य खनन गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों और वहां रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना है। इसके लिए खनन और खदान पट्टाधारकों से प्राप्त राशि DMF में जमा की जाती है।

CAG ने पाया कि छत्तीसगढ़ DMF नियम, 2015 में ‘प्रभावित लोगों’ की परिभाषा को इस तरह विस्तृत किया गया कि प्रभावित क्षेत्र में रहने या काम करने वाले सभी लोगों को इसमें शामिल कर लिया गया। इससे सीधे खनन गतिविधियों से प्रभावित आबादी और व्यापक क्षेत्र के बीच का अंतर काफी हद तक समाप्त हो गया।

इसका असर फंड के इस्तेमाल पर भी पड़ा। DMF ट्रस्टों ने सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को मुफ्त सामान बांटने पर ₹709.47 करोड़ खर्च किए।

CAG ने इनमें से 30 मामलों की जांच की, जिनकी कुल राशि ₹28.11 करोड़ थी। ऑडिट में पाया गया कि इन मामलों में सामान बांटने के लिए स्पष्ट पात्रता मानदंड तय नहीं थे। लाभार्थियों की पहले से पहचान भी नहीं की गई थी और वितरण प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं थी।

इससे यह सवाल उठा कि DMF की राशि वास्तव में उन लोगों तक पहुंची या नहीं, जो खनन गतिविधियों से सबसे अधिक प्रभावित हैं।

1,734 सीधे प्रभावित गांवों में से 754 अब भी कवरेज से बाहर

CAG की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष सीधे प्रभावित गांवों को लेकर है।

ऑडिट के लिए चुने गए 11 जिलों में कुल 1,734 सीधे प्रभावित गांव चिन्हित किए गए थे। इनमें से 754 गांव यानी करीब 44 प्रतिशत गांव ऐसे पाए गए, जो DMF से संबंधित विकास कार्यों के दायरे में नहीं आ सके।

यह स्थिति तब है, जब इन जिलों में उपलब्ध फंड का बड़ा हिस्सा खर्च किया जा चुका था। रिपोर्ट के मुताबिक करीब ₹4,536.58 करोड़, यानी उपलब्ध राशि का लगभग 81 प्रतिशत, खर्च हो गया था।

इससे सवाल उठता है कि जब सीधे प्रभावित गांवों का बड़ा हिस्सा अभी भी योजनाओं से बाहर था, तब इतनी बड़ी राशि किन कार्यों पर खर्च की गई।

प्रभावित क्षेत्र चिन्हित करने में पांच महीने से पांच साल तक की देरी

ऑडिट में यह भी सामने आया कि कई जिलों में प्रभावित क्षेत्रों की पहचान समय पर नहीं की गई। अलग-अलग मामलों में इसमें पांच महीने से लेकर पांच वर्ष तक की देरी हुई।

और इससे भी गंभीर बात यह रही कि प्रभावित क्षेत्रों की पहचान होने से पहले ही ₹1,060.70 करोड़ की राशि आवंटित कर दी गई।

CAG के अनुसार सीधे प्रभावित गांवों की सूचियां कलेक्टर कार्यालयों के आदेशों से जारी की गईं, लेकिन DMF नियमों के मुताबिक जिस तरह की अधिसूचना आवश्यक थी, उस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

इस तरह एक ओर प्रभावित क्षेत्रों की पहचान में देरी हुई, वहीं दूसरी ओर उन क्षेत्रों की आधिकारिक पहचान से पहले ही फंड का आवंटन किया गया।

गेट, गार्डन और सरकारी दफ्तरों पर भी DMF का पैसा

DMF का पैसा मुख्य रूप से खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के जीवन और आजीविका में सुधार के लिए खर्च किया जाना था। लेकिन CAG ने ऐसे कई खर्चों की ओर इशारा किया है, जिन्हें योजना की प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं माना गया।

ऑडिट में स्वागत द्वार, कलेक्ट्रेट परिसर में गार्डन, सरकारी कार्यालय भवनों के निर्माण और नवीनीकरण, कार्यालय सामग्री की खरीद, सरकारी वाहनों सहित ऐसे अन्य कार्यों पर खर्च का उल्लेख किया गया है।

इसके अलावा कुछ निजी शिक्षण संस्थानों को भी अनुदान दिए गए।

रिपोर्ट के अनुसार ऐसे खर्च PMKKKY के मूल उद्देश्यों और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों से मेल नहीं खाते थे।

मास्टर प्लान नहीं, फिर भी करोड़ों की योजनाएं

खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए केवल तत्काल खर्च करना पर्याप्त नहीं है। PMKKKY के तहत दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास की योजना बनाई जानी चाहिए, ताकि खनन गतिविधियों से प्रभावित लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कौशल विकास और आजीविका के क्षेत्र में स्थायी लाभ मिल सके।

लेकिन CAG ने पाया कि कई मामलों में मास्टर प्लान, विजन डॉक्यूमेंट और वार्षिक योजनाएं तैयार किए बिना ही फंड का इस्तेमाल किया गया।

यानी कई जगह यह स्पष्ट योजना नहीं थी कि अगले कुछ वर्षों में खनन प्रभावित क्षेत्रों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को किस तरह बेहतर बनाया जाएगा।

₹41.80 करोड़ का काम अधूरा, संपत्तियां बेकार

कमजोर योजना और निगरानी का सीधा असर कई परियोजनाओं पर पड़ा। CAG ने ₹41.80 करोड़ के निष्फल व्यय की पहचान की।

इसमें अधूरे काम और ऐसी परिसंपत्तियां शामिल थीं, जिनका अपेक्षित उपयोग नहीं हो सका। इनमें कला एवं संस्कृति केंद्र, बायोगैस पावर प्लांट, पोल्ट्री केंद्र और मशरूम उत्पादन केंद्र जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।

ऐसी परियोजनाओं पर पैसा खर्च होने के बावजूद यदि उनका उपयोग नहीं हो पाया तो DMF के मूल उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सरकारी कार्यालयों पर ₹30.73 करोड़ खर्च

CAG ने एक अन्य श्रेणी में ₹30.73 करोड़ के खर्च की पहचान की, जो सरकारी कार्यालयों के निर्माण, नवीनीकरण, सौंदर्यीकरण और खरीद से संबंधित था।

रिपोर्ट के अनुसार ये खर्च PMKKKY के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के अनुरूप नहीं थे।

यानी जिस फंड का मूल उद्देश्य खनन प्रभावित आबादी को स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, स्वच्छता, आजीविका और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना था, उसका एक हिस्सा सरकारी कार्यालयों से जुड़े कार्यों में चला गया।

₹17.49 करोड़ की खरीद में खुले टेंडर नहीं

CAG ने खरीद प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं।

ऑडिट में पाया गया कि करीब ₹17.49 करोड़ की वस्तुओं और सेवाओं की खरीद सीमित कोटेशन के जरिए की गई, जबकि खुले टेंडर की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी।

इसके अलावा ₹38.82 करोड़ की खरीद ऐसी थी, जिसमें आवश्यक तकनीकी विनिर्देश निर्धारित नहीं किए गए थे।

यह प्रक्रिया छत्तीसगढ़ स्टोर परचेज रूल्स, 2002 के प्रावधानों के विपरीत पाई गई।

इस तरह करोड़ों रुपये के खर्च में प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी खरीद प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए हैं।

कई जिलों में कर्मचारियों के पद खाली

DMF योजनाओं को लागू करने और उनकी निगरानी के लिए पर्याप्त मानव संसाधन भी उपलब्ध नहीं था।

रिपोर्ट में परियोजना समन्वयक, सहायक परियोजना समन्वयक, लेखाकार और सहायक जैसे महत्वपूर्ण पदों के खाली रहने का उल्लेख किया गया है।

बेमेतरा और महासमुंद में 100 प्रतिशत तक मानव संसाधन की कमी पाई गई। वहीं बालोद, बिलासपुर, रायगढ़ और राजनांदगांव में भी 50 प्रतिशत से अधिक पद खाली पाए गए।

CAG ने माना कि पर्याप्त स्टाफ नहीं होने का सीधा असर योजनाओं की निगरानी, क्रियान्वयन और वित्तीय नियंत्रण पर पड़ सकता है।

DMF खातों के CAG ऑडिट का प्रावधान भी लागू नहीं

रिपोर्ट में पारदर्शिता से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कमी की ओर भी इशारा किया गया है।

राज्य सरकार ने PMKKKY के उस प्रावधान को लागू नहीं किया, जिसके तहत DMF खातों का ऑडिट भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा किया जाना था।

जब हजारों करोड़ रुपये का सार्वजनिक धन किसी विशेष उद्देश्य के लिए एकत्रित किया जा रहा हो, तब उसके इस्तेमाल की स्वतंत्र और प्रभावी ऑडिट व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होती है।

छोटे खनिजों के DMF भुगतान की ऑनलाइन निगरानी में कमी

राज्य का Khanij Online पोर्टल बड़े खनिजों के लिए रॉयल्टी के साथ DMF योगदान के भुगतान की सुविधा देता है। लेकिन छोटे खनिजों के मामले में ऐसी समान व्यवस्था नहीं पाई गई।

इसके अलावा छोटे खनिजों के परिवहन के लिए जारी किए जाने वाले Form-2 में रॉयल्टी के साथ DMF भुगतान की जानकारी दर्ज करने का प्रावधान नहीं था।

इससे यह जांचना मुश्किल हो गया कि किसी विशेष खनन पट्टे से DMF में कितना योगदान जमा हुआ।

यानी एक तरफ DMF में आने वाली राशि की निगरानी में कमी रही और दूसरी तरफ खर्च की निगरानी भी कई मामलों में कमजोर पाई गई।

नियमों के खिलाफ राज्य स्तरीय DMF सेल को ₹1.68 करोड़

CAG ने DMF नियमों के उल्लंघन का एक और मामला सामने रखा है।

DMF ट्रस्टों ने ₹1.68 करोड़ की राशि राज्य स्तरीय DMF सेल को स्थानांतरित की, जबकि केंद्र सरकार के आदेशों में इस तरह के हस्तांतरण पर रोक थी।

मार्च 2024 तक राज्य स्तरीय DMF सेल के पास ₹10.82 करोड़ की राशि बकाया थी।

इससे फंड के इस्तेमाल, हस्तांतरण और हिसाब-किताब की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हुए हैं।

वार्षिक खाते और ऑडिटर रिपोर्ट भी समय पर नहीं पहुंचीं

CAG ने यह भी पाया कि वार्षिक खाते और ऑडिटर की रिपोर्ट संबंधित जिला पंचायतों और राज्य सरकार को निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रस्तुत नहीं की गईं।

इन दस्तावेजों को राज्य विधानमंडल के समक्ष रखने की व्यवस्था भी प्रभावित हुई।

ऐसी स्थिति में जनप्रतिनिधियों और आम जनता के लिए यह जानना मुश्किल हो जाता है कि DMF से कितनी राशि आई, कहां खर्च हुई और उसका वास्तविक लाभ किसे मिला।

CAG की सिफारिश- पहले प्रभावित लोग और गांव तय हों

रिपोर्ट में कमियों को दूर करने के लिए CAG ने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं।

सबसे पहले प्रभावित लोगों और प्रभावित गांवों की स्पष्ट पहचान और अधिसूचना की प्रक्रिया पूरी करने की जरूरत बताई गई है। इसके बाद खनन क्षेत्रों के लिए मास्टर प्लान और वार्षिक योजनाएं तैयार करने पर जोर दिया गया है।

CAG ने योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी मजबूत करने और सोशल ऑडिट कराने की भी सिफारिश की है। इसके साथ ही अलग-अलग विभागों और DMF संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत बताई गई है।

सवाल अब जवाबदेही का

DMF में जमा होने वाली राशि कोई सामान्य सरकारी फंड नहीं है। यह राशि खनन गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों और लोगों के कल्याण के उद्देश्य से जुटाई जाती है। इसलिए इसके खर्च की प्राथमिकता भी उसी आधार पर तय होनी चाहिए।

CAG की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में ₹13,101 करोड़ जमा हुए और ₹10,253 करोड़ खर्च भी किए गए, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में सीधे प्रभावित गांव योजनाओं के दायरे से बाहर रहे।

दूसरी ओर सरकारी कार्यालयों, सौंदर्यीकरण, वाहनों और अन्य गैर-प्राथमिकता वाले कामों पर खर्च, अधूरी परियोजनाओं में फंसी राशि और खरीद प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी जैसे मामले सामने आए हैं।

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