विवाहित बेटों को लाभ देना, मगर बेटियों को सिर्फ वैवाहिक स्थिति के आधार पर रोकना असंवैधानिक, हाईकोर्ट ने बैंक को नियुक्ति के आदेश दिए

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल विवाहित होने के आधार पर बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब उसी योजना के तहत विवाहित बेटों को नियुक्ति का लाभ दिया गया हो। कोर्ट ने ऐसी व्यवस्था को मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14 व 15 का उल्लंघन माना है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ राज ग्रामीण बैंक के दो कर्मचारियों की मृत्यु के बाद उनकी विवाहित बेटियों द्वारा दायर दो रिट अपीलों पर यह फैसला सुनाया। दोनों कर्मचारियों की मृत्यु सेवाकाल में हुई थी। इसके बाद उनकी बड़ी विवाहित बेटियों ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन बैंक ने उन्हें नियुक्ति देने से इनकार कर दिया था।

योजना में वैवाहिक स्थिति को नहीं बनाया गया आधार

अपीलकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि केवल विवाह के आधार पर उन्हें नियुक्ति के विचार से बाहर करना लैंगिक और वैवाहिक स्थिति पर आधारित भेदभाव है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के विपरीत है।

बैंक ने दलील दी कि अनुकंपा नियुक्ति योजना में मृत कर्मचारी के ‘पूरी तरह आश्रित पुत्र या पुत्री’ को पात्र माना गया है, लेकिन विवाहित बेटियों को आश्रित परिवार के सदस्य की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है।

हाईकोर्ट ने योजना की भाषा का परीक्षण करते हुए कहा कि इसमें ‘पूरी तरह आश्रित पुत्र’ और ‘पूरी तरह आश्रित पुत्री’ का उल्लेख है, लेकिन बेटी के विवाहित या अविवाहित होने के आधार पर कोई वर्गीकरण नहीं किया गया है। इसी तरह, पुत्र के लिए भी उसकी वैवाहिक स्थिति को लेकर कोई अलग शर्त नहीं है। इसलिए योजना में निर्णायक कसौटी आश्रित होना है, वैवाहिक स्थिति नहीं।

विवाहित बेटों को नियुक्ति, तो बेटियों के लिए अलग नियम क्यों?

कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किया कि बैंक स्वयं स्वीकार कर चुका है कि कई विवाहित बेटों को अनुकंपा नियुक्ति दी गई है। बैंक की यह दलील कि सामाजिक व्यवस्था में विवाहित बेटा सामान्यतः अपने माता-पिता के परिवार का भरण-पोषण करता रहता है, जबकि विवाहित बेटी को उसके ससुराल परिवार का हिस्सा माना जाता है, कोर्ट को स्वीकार्य नहीं हुई।

हाईकोर्ट ने कहा कि संवैधानिक समानता के प्रावधान ऐसे रूढ़िगत अनुमानों को प्रशासनिक निर्णय का आधार बनाने की अनुमति नहीं देते। यदि विवाह किसी बेटे को आश्रित परिवार के सदस्य के रूप में माने जाने से नहीं रोकता, तो यही मानक बेटी पर भी लागू होना चाहिए।

आश्रितता का फैसला तथ्यों से होगा

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दीप शिखा बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड मामले पर बैंक की निर्भरता को भी खारिज किया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह फैसला मोटर वाहन अधिनियम के तहत आश्रितता के आधार पर मुआवजे से संबंधित था। उसे अनुकंपा नियुक्ति की योजना पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि हर विवाहित बेटी विवाह के बाद अपने माता-पिता के परिवार पर आश्रित होना बंद कर देती है, ऐसा कोई कठोर सिद्धांत उस फैसले में नहीं है। आश्रितता मूल रूप से तथ्य का प्रश्न है और प्रत्येक मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इसका निर्धारण किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी ने ‘आश्रितता’ की वास्तविक जांच करने के बजाय वैवाहिक स्थिति को ही निर्णायक मान लिया, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। कसौटी वास्तविक आर्थिक और पारिवारिक आश्रितता होनी चाहिए, न कि केवल विवाह।

बैंक को अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश

डिवीजन बेंच ने कहा कि जब बैंक ने विवाहित बेटों को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिया है, तो केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर विवाहित बेटियों को उसी लाभ से वंचित करना मनमाना और भेदभावपूर्ण है।

कोर्ट ने दोनों अपीलें मंजूर करते हुए संबंधित बैंक को अपीलकर्ताओं के पक्ष में अनुकंपा नियुक्ति के आदेश जारी करने के निर्देश दिए।

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