विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और लिव-इन संबंधों पर सामाजिक संगठनों ने रखे विचार; समिति ने कहा- सभी सुझावों का गहराई से होगा अध्ययन
रायपुर। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) के संभावित क्रियान्वयन को लेकर गठित उच्च स्तरीय समिति की दो दिवसीय परामर्श बैठक शुक्रवार को संपन्न हो गई। ओल्ड सर्किट हाउस के कॉन्फ्रेंस हॉल में हुई इस बैठक में सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों, विभिन्न राज्य आयोगों के प्रमुखों, अधिवक्ताओं और अन्य प्रतिनिधियों ने यूसीसी से जुड़े महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दों पर अपने सुझाव रखे।
बैठक की अध्यक्षता समिति के सदस्य एवं पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एमके राउत ने की। समिति के सदस्य एवं वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार भी बैठक में मौजूद रहे। शुरुआती सत्र में यूसीसी से संबंधित मौजूदा कानूनों और नियमों की स्थिति पर प्रस्तुति दी गई, जिसके बाद विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श किया गया।
विवाह से उत्तराधिकार तक कई मुद्दों पर चर्चा
दो दिवसीय बैठक में यूसीसी के संभावित प्रभावों से जुड़े कई प्रमुख विषयों पर खुलकर सुझाव मांगे गए। इनमें विवाह और तलाक, उत्तराधिकार एवं विरासत, भरण-पोषण तथा लिव-इन संबंध जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
समिति ने विभिन्न सामाजिक और सामुदायिक प्रतिनिधियों की बात गंभीरता से सुनी। बैठक का उद्देश्य अलग-अलग वर्गों की सामाजिक, सांस्कृतिक और कानूनी आवश्यकताओं को समझना तथा उनके आधार पर एक संतुलित और समावेशी मसौदा तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ना बताया गया।
आदिवासी समाज को यूसीसी से बाहर रखने की मांग
गोंडी धर्म संस्कृति संरक्षण समिति के प्रांतीय सचिव गजानंद नुरूटी ने बैठक में आदिवासी समाज की विशिष्ट परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय की अपनी पारंपरिक व्यवस्थाएं और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है, इसलिए इसे समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए।
उन्होंने समिति से आदिवासी समाज की परंपराओं, अधिकारों और विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए विशेष प्रावधान किए जाने का आग्रह किया।
महिला-पुरुष समानता और संपत्ति में बराबर अधिकार पर जोर
राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष अमरजीत सिंह छाबड़ा ने समाज में लैंगिक समानता को मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने पुरुषों और महिलाओं के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने के साथ ही बेटे और बेटी को संपत्ति में समान उत्तराधिकार देने की व्यवस्था का सुझाव दिया।
उन्होंने विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण किए जाने तथा संपत्ति और वसीयत से जुड़े मामलों में स्पष्ट कानूनी प्रावधान बनाने की आवश्यकता भी बताई। उनके अनुसार स्पष्ट और पारदर्शी कानूनी व्यवस्था से नागरिकों के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
ईसाई समुदाय ने विवाह को बताया अटूट बंधन
ईसाई समुदाय की ओर से राजेश जॉन पाल सहित प्रतिनिधियों ने विवाह को ईश्वर द्वारा स्थापित अटूट संबंध के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि उनके समुदाय में विवाह को सामान्यतः ऐसा बंधन माना जाता है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता।
प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि ईसाई सामाजिक व्यवस्था में लिव-इन संबंधों को स्वीकार्यता नहीं है। उन्होंने यूसीसी तैयार करते समय धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं को ध्यान में रखने की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।
बच्चों के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा पर भी चर्चा
राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष वर्णिका शर्मा ने भी बैठक में हिस्सा लिया। उन्होंने बच्चों के अधिकारों, उनके संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर समिति के समक्ष अपने विचार रखे।
समिति ने कहा कि बैठक में प्राप्त सभी सुझावों का गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ अध्ययन किया जाएगा। अलग-अलग सामाजिक समूहों से मिले व्यावहारिक सुझावों को संकलित कर उनके कानूनी और सामाजिक प्रभावों का परीक्षण किया जाएगा, ताकि तैयार होने वाला मसौदा समावेशी, संतुलित और निष्पक्ष हो।
स्पष्ट और पारदर्शी कानून की जरूरत बताई गई
बैठक में वरिष्ठ अधिवक्ता बृजेश पांडे, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष दिनेश देवांगन, एडवोकेट्स काउंसिल के अध्यक्ष प्रमोद तिवारी और वरिष्ठ उपाध्यक्ष भारती राठौर ने भी अपने सुझाव दिए।
अधिवक्ताओं ने यूसीसी के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के साथ-साथ उनकी भाषा और कानूनी व्याख्या को स्पष्ट रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि किसी भी नई कानूनी व्यवस्था में पारदर्शिता और स्पष्टता महत्वपूर्ण है, ताकि आम नागरिकों को अपने अधिकारों और दायित्वों को समझने में कठिनाई न हो।
सामाजिक और पेशेवर संगठनों ने भी रखे विचार
बैठक के दूसरे सत्र में कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष डॉ. सुरेश मिश्रा और आशीष बाजपेयी ने यूसीसी से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे।
चिकित्सा क्षेत्र की ओर से डॉ. कुलदीप सोलंकी, डॉ. सुरभि दुबे और डॉ. केपी अजमानी ने भी समान नागरिक संहिता के क्रियान्वयन को लेकर अपने सुझाव समिति के सामने रखे। उन्होंने कानून के सामाजिक प्रभावों और इसके क्रियान्वयन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार साझा किए।
सभी वर्गों की राय को शामिल करने की कोशिश
दो दिवसीय बैठक से यह स्पष्ट हुआ कि यूसीसी को लेकर अलग-अलग सामाजिक और धार्मिक समूहों की अपनी विशिष्ट चिंताएं और अपेक्षाएं हैं। एक ओर आदिवासी समाज ने अपनी परंपरागत व्यवस्था और पहचान की सुरक्षा की मांग रखी, वहीं अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों ने समान अधिकार और लैंगिक समानता पर जोर दिया। ईसाई समुदाय ने धार्मिक मान्यताओं को ध्यान में रखने की बात कही, जबकि विधि विशेषज्ञों ने स्पष्ट और पारदर्शी कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता बताई।
समिति ने सभी पक्षों को सुनने के बाद भरोसा दिलाया कि प्राप्त सुझावों को महज औपचारिकता के रूप में नहीं देखा जाएगा। इनका विस्तृत अध्ययन कर यूसीसी के संबंध में आगे की प्रक्रिया और मसौदा तैयार करने में आवश्यक बिंदुओं को शामिल किया जाएगा।














