रायगढ़ में इंसान और हाथी दोनों के सामने बढ़ता जा रहा है जीवन का संकट
रायगढ़। जंगल की पगडंडियों पर भटकता एक नन्हा हाथी रविवार सुबह अचानक चाल्हा हाईस्कूल के सामने पहुंच गया। वह अकेला था- न मां साथ थी, न हाथियों का झुंड। चार दिनों से अपने दल से बिछड़ा यह शावक जंगल और उसके आसपास भटकते-भटकते इंसानी बस्ती की दहलीज तक आ पहुंचा। सामने स्कूल था, आसपास घनी आबादी और दूसरी ओर बेचैनी से उसकी निगरानी करता वन अमला।
सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। लोगों को हाथी के पास जाने से रोका गया और इलाके की घेराबंदी कर निगरानी बढ़ाई गई। कुछ देर बाद शावक कचिरा के जंगलों की ओर बढ़ गया। वन विभाग और हाथी मित्र दल अब उसकी गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं और कोशिश है कि वह सुरक्षित अपनी मां और झुंड तक लौट सके। हाल की रिपोर्टों के मुताबिक, शावक पहले करीब सात हाथियों के झुंड के साथ था और रात में दल आगे बढ़ गया, जबकि वह पीछे छूट गया।
एक शावक की कहानी, लेकिन सवाल बहुत बड़ा
इस नन्हे हाथी की कहानी सिर्फ एक बिछड़े बच्चे की कहानी नहीं है। यह उस बदलती दुनिया की तस्वीर भी है, जहां जंगल सिकुड़ते हैं, हाथियों के रास्ते इंसानी बस्तियों और खेतों से होकर गुजरते हैं और टकराव का खतरा दोनों तरफ बढ़ता जाता है।
रायगढ़ और धरमजयगढ़ का इलाका इस संघर्ष का बड़ा केंद्र बन चुका है। हाल में रायगढ़ में हाथियों ने 21 किसानों की धान की फसल रौंद दी और एक कच्चे मकान को भी नुकसान पहुंचाया। अगस्त के अंत में अलग-अलग इलाकों में 39 किसानों की धान की फसल को हाथियों ने नुकसान पहुंचाया था। उस समय जिले में 169 हाथियों की मौजूदगी दर्ज की गई थी।
रात खेत में नहीं, हाथियों की निगरानी में गुजर रही
हाथियों की आवाजाही ने ग्रामीणों की रोजी-रोटी को भी प्रभावित किया है। धान जैसी फसल उनके लिए सिर्फ खेत की हरियाली नहीं, बल्कि पूरे साल की कमाई है। एक रात में फसल बर्बाद होने का मतलब परिवार के बजट का बिगड़ जाना है।
रायगढ़ में स्थिति इतनी गंभीर रही है कि कुछ गांवों में लोग रात आठ बजे के बाद खेतों और धान खरीदी केंद्रों की निगरानी के लिए जागते रहे हैं। दिसंबर 2025 में बेंगुरसिया के धान खरीदी केंद्र में हाथियों ने दस दिनों में 70 से अधिक बोरी धान को नुकसान पहुंचाया था। ग्रामीण रातभर हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखने को मजबूर हुए।
किसी का घर टूटा, किसी की जान गई
यह संघर्ष केवल फसल तक सीमित नहीं है। जुलाई में रायगढ़ के आसपास हाथियों ने कई घरों और धान की नर्सरी तथा खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाया था। इसी दौरान छत्तीसगढ़ के उत्तर क्षेत्र में हाथियों के हमलों में लोगों की मौतें भी हुईं। रायगढ़ के छाल और कापू वन क्षेत्र में जुलाई में दो अलग-अलग घटनाओं में दो ग्रामीणों की जान चली गई थी।
यानी एक तरफ किसान अपनी फसल और घर बचाने के लिए रातें जाग रहा है, तो दूसरी तरफ हाथी भोजन और सुरक्षित रास्ते की तलाश में उसी इलाके में पहुंच रहा है जहां इंसान पहले से रह रहा है।
हाथियों के रास्ते भी आसान नहीं रहे
पर्यावरण मंत्रालय की 2025 की रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष को लगातार बढ़ती चिंता बताया है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले 23 वर्षों में राज्य में मानव-हाथी संघर्ष से 737 लोगों की मौत और 91 लोगों के घायल होने के मामले दर्ज हुए, जबकि 84 हाथियों की भी मौत हुई। रिपोर्ट ने मानव गतिविधियों और संघर्ष के स्तर के बीच मजबूत संबंध की ओर इशारा किया है।
यही वजह है कि चाल्हा का यह नन्हा शावक एक उम्मीद भी है और चेतावनी भी। उम्मीद इसलिए कि वन विभाग उसे उसकी मां तक पहुंचाने में जुटा है। चेतावनी इसलिए कि यदि हाथियों के प्राकृतिक रास्ते और भोजन के क्षेत्र सुरक्षित नहीं रहे, तो ऐसे बिछड़ाव और इंसानी बस्तियों में पहुंचने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
अभी सबसे जरूरी, शावक को मां से मिलाना
फिलहाल वन विभाग और हाथी मित्र दल शावक को सुरक्षित दूरी से ट्रैक कर रहे हैं। ग्रामीणों से भी अपील की गई है कि वे हाथी के करीब न जाएं, उसे घेरें नहीं और उसकी गतिविधियों में हस्तक्षेप न करें।
एक मां अपने बच्चे को खोज रही होगी और जंगल में एक नन्हा हाथी अपने झुंड की आवाज तलाश रहा होगा। उम्मीद यही है कि जंगल की वह आवाज जल्द उसे मिल जाए और यह मुलाकात इंसानों और हाथियों, दोनों के लिए सुकून लेकर आए।














