कोर्ट ने कहा- राज्य से मिली संस्थागत शक्ति पुलिस अधिकारी को प्रभावशाली स्थिति में रखती है, इसलिए दबाव में बनी सहमति को स्वतः स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपी आरक्षक रुद्रमणि यादव की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय ने मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस अधिकारी की संस्थागत शक्ति और पीड़िता की सहमति के पहलू पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारी को अपनी संस्था और राज्य से अधिकार प्राप्त होता है, जिससे वह प्रभावशाली स्थिति में रहता है। ऐसी स्थिति में यदि कोई महिला दबाव, भय या कानूनी कार्रवाई के डर से संबंध के लिए सहमत होती है, तो उस सहमति को स्वतः ‘स्वतंत्र सहमति’ नहीं माना जा सकता।
लगातार जबरन संबंध बनाने का आरोप
मामला जशपुर जिले के कांसाबेल थाना क्षेत्र का है। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(n) और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत मामला दर्ज है। आरोपी ने विशेष न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए एससी/एसटी अधिनियम की धारा 14-ए(2) के तहत आपराधिक अपील दायर की थी।
शिकायत के अनुसार, पीड़िता की आरोपी से वर्ष 2023 में फेसबुक के माध्यम से पहचान हुई थी। आरोप है कि आरक्षक ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए महिला के साथ कई बार जबरन यौन संबंध बनाए। इससे वह गर्भवती हो गई। शिकायत में आरोपी पर महिला से दो लाख रुपये लेने, बाद में गर्भपात कराने और धमकी देने के आरोप भी लगाए गए हैं। यह भी आरोप है कि उसने महिला की तस्वीरें उसके रिश्तेदारों के बीच प्रसारित कीं।
तीन साल तक शिकायत नहीं करने की दलील
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि वह और पीड़िता जनवरी 2023 से एक-दूसरे को जानते थे। दोनों बालिग हैं और महिला दो बच्चों की मां है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि घटना के करीब तीन साल तक पीड़िता ने कोई शिकायत नहीं की।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को इस स्तर पर अग्रिम जमानत देने का आधार नहीं माना। अदालत ने मामले में पुलिसकर्मी की पदगत स्थिति और लगाए गए बार-बार जबरन संबंध तथा शोषण के आरोपों को महत्वपूर्ण माना।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले के तथ्यों को अन्य सामान्य मामलों से अलग करके देखा जाना जरूरी है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए आरक्षक रुद्रमणि यादव की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई।













