बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के मस्तूरी तहसील के हिर्री गांव में एक दर्दनाक और भयावह घटना ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया था। पति ने अपनी पत्नी और तीन मासूम बच्चों की बेरहमी से हत्या कर दी। इस जघन्य अपराध के लिए जिला न्यायालय ने आरोपी उमेंद्र केवट को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। इस फैसले को “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” मामलों में से एक माना गया है।
क्या हुआ था नए साल पर?
1 जनवरी 2024 की रात, जब पूरा देश नए साल के जश्न में डूबा हुआ था, हिर्री गांव में उमेंद्र केवट (34) ने अपनी पत्नी सुक्रिता केवट (32) और तीन बच्चों—खुशी (5), लिसा (3), और 18 महीने के पवन—की गला घोंटकर हत्या कर दी।
उमेंद्र केवट के परिवार ने नए साल के जश्न के रूप में केक काटा और रात्रि भोज किया। परिवार ने पूरे उल्लास के साथ जश्न मनाया, और उसके बाद सभी सोने चले गए। परंतु, कोई नहीं जानता था कि उमेंद्र के मन में अपनी पत्नी के चरित्र पर शक की आग जल रही थी, जो इतनी भयानक होगी कि वह अपने ही परिवार का संहार कर देगा।
भयावहता और पुलिस जांच
हत्या की वजह उमेंद्र केवट की अपनी पत्नी पर चरित्र शंका थी। घटना की रात जब सुक्रिता बाड़ी में गई थी, तो उमेंद्र ने पीछे से जाकर नायलॉन की रस्सी से उसका गला घोंट दिया। इसके बाद, उसने घर के अंदर सो रहे अपने तीन मासूम बच्चों का भी एक-एक करके गला घोंट दिया।
घटना की जानकारी सुबह गांव वालों को मिली, तो हड़कंप मच गया। उमेंद्र ने खुद पुलिस थाने जाकर इस हत्या की जानकारी दी, जिससे पुलिस भी स्तब्ध रह गई। पुलिस ने तत्काल मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया और शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। जांच के दौरान, पुलिस ने पाया कि सभी की मौत गला घोंटने से हुई थी। पुलिस ने तत्परता से कार्रवाई करते हुए चार महीने के भीतर चालान पेश किया।
न्यायालय की प्रक्रिया और सुनवाई
मामले की सुनवाई दशम अपर सत्र न्यायाधीश अविनाश के. त्रिपाठी की अदालत में हुई। शासन की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक लक्ष्मीकांत तिवारी और अभिजीत तिवारी ने सभी साक्ष्यों और गवाहों को पेश किया।
अभियोजन पक्ष ने अदालत में यह साबित किया कि उमेंद्र ने सोची-समझी योजना के तहत अपने पूरे परिवार की हत्या की थी। उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट, घटनास्थल से मिले साक्ष्य, और गवाहों की गवाही के आधार पर यह स्थापित किया कि यह अपराध न केवल क्रूर था बल्कि इसके पीछे कोई पश्चाताप भी नहीं था।
अदालत का फैसला
दशम अपर सत्र न्यायाधीश अविनाश के. त्रिपाठी ने मामले की त्वरित सुनवाई करते हुए, इस अपराध को “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” मानते हुए उमेंद्र केवट को मृत्युदंड की सजा सुनाई। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि उमेंद्र केवट ने जिस निर्ममता से अपने परिवार की हत्या की, उसके लिए मृत्युदंड ही उचित सजा है। इसके अलावा, अदालत ने उमेंद्र को 10 हजार रुपये के अर्थदंड से भी दंडित किया। यदि उमेंद्र यह रकम अदा नहीं करता है, तो उसे तीन महीने की अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी।
फांसी पर चढ़ाना आसान नहीं
जब ट्रायल कोर्ट (जिला अदालत या सत्र न्यायालय) किसी आरोपी को मृत्यु दंड (फांसी) की सजा सुनाता है, तो भारतीय न्यायिक प्रणाली के तहत उस सजा की पुष्टि के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान होते हैं। यह प्रावधान सुनिश्चित करते हैं कि मृत्यु दंड जैसी गंभीर सजा देने में किसी भी प्रकार की त्रुटि या अन्याय न हो।
1. अनिवार्य पुष्टि (Confirmation)
मृत्यु दंड की सजा को तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक कि उच्च न्यायालय (High Court) उसकी पुष्टि (Confirmation) न कर दे। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 366 के तहत, जब भी किसी व्यक्ति को ट्रायल कोर्ट द्वारा मृत्युदंड दिया जाता है, तो उस मामले को अनिवार्य रूप से उच्च न्यायालय के समक्ष पुष्टि के लिए भेजा जाता है। उच्च न्यायालय इस सजा की समीक्षा करती है और पुष्टि करती है कि सजा सही और कानून के अनुसार है या नहीं।
2. अपील का अधिकार (Right to Appeal)
सजा सुनाए जाने के बाद, आरोपी को उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार होता है। अगर उच्च न्यायालय पुष्टि करती है और अपील खारिज हो जाती है, तो आरोपी के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का भी अधिकार होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत, सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) दाखिल की जा सकती है।
3. दया याचिका (Mercy Petition)
अगर सुप्रीम कोर्ट भी मृत्युदंड की सजा की पुष्टि कर देता है, तो आरोपी के पास भारत के राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष दया याचिका (Mercy Petition) दाखिल करने का अधिकार होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 और अनुच्छेद 161 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल को दया याचिका पर विचार करने का अधिकार दिया गया है।
4. पुनर्विचार याचिका (Review Petition) और क्यूरेटिव याचिका (Curative Petition)
सुप्रीम कोर्ट से सजा की पुष्टि के बाद, आरोपी पुनर्विचार याचिका (Review Petition) और क्यूरेटिव याचिका (Curative Petition) दाखिल कर सकता है। पुनर्विचार याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले की समीक्षा की जाती है, और क्यूरेटिव याचिका में किसी न्यायिक त्रुटि की समीक्षा होती है।
5. समय लगेगा सजा लागू करने में
मृत्यु दंड की सजा के लागू होने में समय लगता है, क्योंकि यह सुनिश्चित किया जाता है कि आरोपी को पर्याप्त समय और कानूनी सहायता मिल सके। सभी कानूनी विकल्प समाप्त होने और दया याचिका खारिज होने के बाद ही सजा को लागू किया जाता है।
इन प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायिक प्रणाली में किसी प्रकार की गलती या अन्याय न हो, और मृत्यु दंड केवल उन्हीं मामलों में दी जाए जो वास्तव में “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” (Rarest of the Rare) की श्रेणी में आते हैं।













