मुआवजा और छत्तीसगढ़ में काम करने की सुरक्षा की उठाई मांग, दो हफ्ते में मांगा जवाब

बिलासपुर पश्चिम बंगाल से छत्तीसगढ़ के कोंडागांव में मजदूरी करने आए 12 श्रमिकों को पुलिस द्वारा बांग्लादेशी नागरिक बताकर गिरफ्तार किए जाने और बाद में भारतीय साबित होने पर छोड़ देने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य शासन को दो हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद एक हफ्ते में याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रति उत्तर दिया जाएगा, जिसके बाद मामले में अगली सुनवाई होगी।

कोंडागांव पुलिस ने मारपीट कर भेजा जेल

पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर और मुर्शिदाबाद जिलों से 12 मजदूर, एक ठेकेदार के माध्यम से कोंडागांव जिले के एक स्कूल निर्माण में काम करने पहुंचे थे। वे करीब 12 दिन से काम कर ही रहे थे कि 12 जुलाई को अचानक साइबर सेल थाना, कोंडागांव की टीम स्कूल निर्माण स्थल पर पहुंची और मजदूरों को सुपरवाइजर श्री पांडेय के साथ गाड़ी में भरकर थाने ले आई।

याचिका के अनुसार, थाने में इन मजदूरों के साथ मारपीट, गाली-गलौज और अमानवीय व्यवहार किया गया। आधार कार्ड और पहचान पत्र दिखाने के बावजूद उन्हें “बांग्लादेशी” कहकर प्रताड़ित किया गया। फिर शाम 6 बजे उन्हें कोतवाली थाने ले जाकर, रात के समय जगदलपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया।

सांसद मोइत्रा ने उठाई आवाज

13 जुलाई को इस घटना की जानकारी मजदूरों के रिश्तेदारों ने पश्चिम बंगाल की सांसद महुआ मोइत्रा को दी। इसके बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने जांच कर सभी 12 लोगों को भारतीय नागरिक बताते हुए रिपोर्ट पेश की। उसी आधार पर अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव और रजनी सोरेन ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की। कोर्ट में सुनवाई से पहले ही 14 जुलाई को एसडीएम कोंडागांव के आदेश से सभी मजदूरों को रिहा कर दिया गया।

फिर भी डराया गया, छोड़ा छत्तीसगढ़

रिहाई के बाद मजदूरों को पुलिस द्वारा धमकाकर छत्तीसगढ़ छोड़ने पर मजबूर किया गया। डरे-सहमे मजदूर अपनी रोजी-रोटी छोड़कर बंगाल लौट गए।

मुआवजे और सुरक्षा की गारंटी मांगी

हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि सभी मजदूर भारतीय नागरिक हैं और उन्हें देश में कहीं भी काम करने का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने न तो कोई अपराध किया, न ही पहचान छिपाई। इसके बावजूद उन्हें गैरकानूनी रूप से हिरासत में लिया गया और प्रताड़ित किया गया।

इसलिए याचिका में तीन प्रमुख मांगें की गई हैं:

  1. उनके खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 128 के तहत की गई कार्रवाई रद्द की जाए।
  2. प्रत्येक मजदूर को ₹1 लाख का मुआवजा दिया जाए।
  3. भविष्य में उन्हें छत्तीसगढ़ में स्वतंत्र रूप से काम करने की सुरक्षा और अधिकार की गारंटी दी जाए।

हाईकोर्ट ने इस गंभीर मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में जवाब देने को कहा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं ने जोरदार दलीलें पेश कीं और पूरे घटनाक्रम को कोर्ट के सामने रखा।

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