बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में पुलिस द्वारा दर्ज की गई दोनों एफआईआर को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह कार्रवाई दुर्भावना से प्रेरित और बिना ठोस साक्ष्य के की गई है, जिसे जारी रखना कानून का दुरुपयोग होगा।

मामला दयालबंद निवासी पीयूष गंगवानी का है। उस पर पुलिस ने दो अलग-अलग केस दर्ज किए थे। पहला केस मई-जून 2022 का है, जिसमें तारबाहर थाना पुलिस ने उस पर महादेव सट्टा ऐप चलाने और फर्जी कंपनी बनाने का आरोप लगाया था। इस मामले में उसे बैंक कर्मचारी जय दुबे के साथ मिलकर म्यूल अकाउंट खोलने का आरोपी बनाया गया था।

दूसरे मामले में उस पर आरोप लगाया गया कि उसने इंस्टाग्राम पर फर्जी आईडी बनाकर आपत्तिजनक फोटो भेजीं और धमकाया। पुलिस ने आईपी एड्रेस के आधार पर उसे आरोपी ठहराया।

पीयूष गंगवानी ने खुद हाईकोर्ट में अपनी पैरवी की और कहा कि पुलिस ने भू-माफिया नरेंद्र मोटवानी और शिकायतकर्ता अभय सिंह राठौर की मिलीभगत से झूठे केस में फंसा दिया। उसका आरोप है कि मोटवानी से उसकी पैतृक संपत्ति को लेकर विवाद था और उसी विवाद के चलते पुलिस अधिकारियों से साजिश कर उसे फर्जी मामलों में फंसा दिया गया। उसने कोर्ट में यह भी बताया कि पुलिस ने फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेज तैयार कर उसे आरोपी बनाया।

शासन की ओर से कहा गया कि पीयूष के खिलाफ केस दर्ज करना कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ और उसके आरोप निराधार हैं। वहीं, नरेंद्र मोटवानी की ओर से कहा गया कि उसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है और उसे बदनाम करने के लिए नाम घसीटा जा रहा है।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा की डिवीजन बेंच ने कहा कि एफआईआर बिना साक्ष्य और प्रक्रियागत खामियों के साथ दर्ज की गई है। इसलिए इसे जारी रखना कानून का गलत इस्तेमाल होगा। अदालत ने अंततः युवक के खिलाफ दर्ज दोनों एफआईआर रद्द करने का आदेश दिया।

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