नेशनल पार्क की नाज़ुक गुफा-परिस्थितिकी पर खतरा होने की चेतावनी दी 

रायपुर। बस्तर अंचल के कांकेर वैली नेशनल पार्क में स्थित अत्यंत दुर्लभ और संवेदनशील ‘ग्रीन केव’ को पर्यटन के लिए खोलने के प्रस्ताव पर वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने गहरी चिंता जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह गुफा एक बंद और स्थिर पारिस्थितिकी तंत्र है, जहां मामूली मानवीय हस्तक्षेप भी अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है।

पर्यटन विस्तार की योजना पर सवाल

माओवादी गतिविधियों में कमी के बाद छत्तीसगढ़ सरकार बस्तर के अधिक स्थलों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर लाने की संभावनाएं तलाश रही है। इसी क्रम में ग्रीन केव को भी पर्यटन स्थल बनाने की बात सामने आई है। राज्य के वन मंत्री ने इसे स्थानीय रोजगार और क्षेत्रीय विकास से जोड़ा है।

हजारों वर्षों में बनी अनोखी गुफा

कोटुमसर क्षेत्र में स्थित यह गुफा भूवैज्ञानिक और जलवैज्ञानिक प्रक्रियाओं से हजारों-लाखों वर्षों में बनी है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका अस्तित्व बेहद खास परिस्थितियों पर निर्भर है—दिन में बहुत सीमित समय की धूप, स्थिर तापमान, अधिक आर्द्रता और पोषक तत्वों की अत्यल्प उपलब्धता।

“दुनिया के सबसे नाज़ुक तंत्रों में से एक”

वैज्ञानिकों ने चेताया कि ऐसी गुफाएं दुनिया के सबसे नाज़ुक पारिस्थितिक तंत्रों में गिनी जाती हैं। महेश जी. ठक्कर, निदेशक, बिरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज के अनुसार, पर्यटकों की आवाजाही से धूल, शोर, कंपन और नमी में बदलाव जैसे प्रभाव तत्काल और दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकते हैं। बिना समग्र वैज्ञानिक और पर्यावरणीय आकलन के गुफा खोलना “वैज्ञानिक रूप से अविवेकपूर्ण” है।

सूक्ष्म जीवन पर बड़ा खतरा

पर्यावरणविदों का कहना है कि गुफा की दीवारों को अनजाने में छूना भी हजारों वर्षों में बनी सूक्ष्मजीवी परतों और बायोफिल्म्स को नष्ट कर सकता है। कृत्रिम रोशनी से आक्रामक शैवाल (लैम्पेनफ्लोरा) पनपती है, जिससे पूरी पारिस्थितिकी बदल जाती है।

ग्रीन केव क्यों है खास

प्रसिद्ध गुफा वैज्ञानिक जयंन्त बिस्वास के अनुसार, कांकेर वैली में अब तक खोजी गई लगभग 27 गुफाओं में यह इकलौती है जहां दिन में करीब एक घंटे धूप पहुंचती है। छत से लटकती स्टैलेक्टाइट्स पर सूक्ष्म हरी परत इसे तेल चित्रकला जैसा रूप देती है। इसी कारण इसे ‘ग्रीन केव’ कहा जाता है। यह कुटुमसर गुफा तंत्र के खंड संख्या 85 में स्थित है, जहां एक बड़ा कक्ष, हरे स्टैलेक्टाइट्स और बहते पानी से बने फ्लोस्टोन मौजूद हैं।

आदिवासी आस्था और निर्माण कार्य की चिंता

यह गुफा स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए धार्मिक महत्व भी रखती है। विडंबना यह है कि पर्यटन सुविधा के नाम पर गुफा प्रवेश के पास कुछ सिविल निर्माण की स्वीकृति की खबरें हैं, जिन्हें विशेषज्ञ शुरुआती चरण में ही गंभीर खतरा मान रहे हैं।

संरक्षण पहले, मनोरंजन बाद में

विशेषज्ञों ने दोहराया कि यदि भविष्य में कभी पर्यटन की अनुमति दी भी जाए, तो वह अत्यंत सीमित, सख्त नियंत्रण और विज्ञान-आधारित होनी चाहिए। पर्यावरणविद नितिन सिंघवी ने वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी को शिकायत भेजकर चेताया है कि पर्यटन से कार्बन डाइऑक्साइड, ताप, नमी, धूल और कंपन बढ़ेंगे, जो गुफा की आंतरिक रसायनिकी और सूक्ष्मजीवी परतों को गंभीर नुकसान पहुंचाएंगे।

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