नई दिल्ली। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने गंभीर सवाल उठाए और तथ्यों के साथ अपनी दलीलें पेश कीं। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने उनकी प्रस्तुति को ध्यान से सुना और उनकी तार्किक दलीलों की प्रशंसा की। सुनवाई के दौरान यादव ने दो ऐसे लोगों को अदालत में पेश किया, जिन्हें चुनाव आयोग (ECI) ने ड्राफ्ट मतदाता सूची में ‘मृत’ घोषित कर दिया था, जिससे कोर्ट में हलचल मच गई।

योगेंद्र यादव की प्रमुख दलीलें और चिंताएँ

  1. बड़े पैमाने पर मतदाताओं का बहिष्कार:
    योगेंद्र यादव ने दावा किया कि SIR प्रक्रिया के तहत बिहार में 65 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, और यदि यह प्रक्रिया जारी रही तो यह संख्या 1 करोड़ तक पहुंच सकती है। उन्होंने इसे “दुनिया के इतिहास में मताधिकार से वंचित करने की सबसे बड़ी कवायद” करार दिया। यादव ने कहा कि बिहार की वयस्क जनसंख्या 18 करोड़ है, लेकिन मतदाता सूची में केवल 7.9 करोड़ लोग शामिल हैं, जिसका मतलब है कि शुरुआत में ही 29 लाख लोगों की कमी थी।
  2. SIR प्रक्रिया की संरचनात्मक विफलता:
    यादव ने तर्क दिया कि SIR प्रक्रिया का डिज़ाइन ही मतदाताओं को हटाने के लिए बनाया गया है, न कि सूची को शुद्ध करने के लिए। उन्होंने कहा कि यह पहली ऐसी पुनरीक्षण प्रक्रिया है जिसमें एक भी नया मतदाता जोड़ा नहीं गया। यादव ने सवाल उठाया, “चुनाव आयोग ने घर-घर जाकर सर्वे किया, फिर भी एक भी नया मतदाता नहीं मिला? यह असाधारण है।”
  3. महिलाओं के खिलाफ पक्षपात:
    यादव ने चिंता जताई कि SIR प्रक्रिया में महिलाओं के नाम पुरुषों की तुलना में अधिक हटाए गए हैं। उन्होंने आंकड़े पेश करते हुए कहा कि 25 लाख पुरुषों की तुलना में 31 लाख महिलाओं के नाम हटाए गए। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम पलायन करती हैं और उनकी मृत्यु दर भी कम है, इसलिए यह असमानता महिला-विरोधी पूर्वाग्रह को दर्शाती है।
  4. 2003 की प्रक्रिया से तुलना:
    यादव ने बताया कि 2003 में बिहार में कोई विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) नहीं हुआ था, बल्कि वह सामान्य गहन पुनरीक्षण था। उस समय कोई फॉर्म या दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं थी, और मतदाता सूचियों को कंप्यूटरीकृत किया जा रहा था। उन्होंने SIR की दो विशेषताओं—गणना फॉर्म की आवश्यकता और गैर-नागरिकता की धारणा—को “अभूतपूर्व और अवैध” करार दिया।
  5. अपील का अधिकार प्रभावहीन:
    यादव ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा दी गई अपील की समय-सीमा अव्यवहारिक है। ड्राफ्ट सूची 1 अगस्त को प्रकाशित हुई, और अंतिम सूची 30 सितंबर को फ्रीज हो जाएगी। यदि किसी का नाम ड्राफ्ट सूची से हटाया जाता है, तो अपील के लिए पर्याप्त समय नहीं होगा, खासकर यदि कोई व्यक्ति चुनाव लड़ना चाहता हो। उन्होंने इसे “उम्मीदवारों को चुनाव से बाहर करने का सबसे अच्छा तरीका” बताया।
  6. BLO की मनमानी शक्ति:
    यादव ने बूथ-स्तरीय अधिकारियों (BLO) द्वारा मतदाताओं के नाम “सिफारिश न करने” के अधिकार की आलोचना की। उन्होंने सवाल उठाया कि BLO ने किस आधार पर लोगों को “अनुशंसित नहीं” किया, और चुनाव आयोग इस डेटा को अदालत के साथ साझा क्यों नहीं कर रहा।
  7. प्रेस रिलीज़ के ज़रिए आदेश में बदलाव:
    यादव ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने SIR के नियमों में प्रेस रिलीज़ के ज़रिए बदलाव किए, जो कानूनी रूप से मान्य नहीं है। उदाहरण के लिए, पहले कहा गया था कि 2003 की मतदाता सूची में न होने वालों को अपने और अपने माता-पिता के प्रमाणपत्र जमा करने होंगे, लेकिन बाद में प्रेस रिलीज़ के ज़रिए इसे बदल दिया गया।

जजों की पीठ ने दलीलों को शानदार बताया

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यादव की दलीलों को गंभीरता से सुना। जस्टिस बागची ने कहा, “चाहे कोर्ट सहमत हो या असहमत, मिस्टर यादव ने दलीलें बहुत शानदार दीं।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आधार कार्ड को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता और इसकी स्वतंत्र जांच ज़रूरी है।

चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने यादव के कदम को “ड्रामा” करार देते हुए कहा कि ऐसी गलतियों को सुधारने के लिए ऑनलाइन फॉर्म भरे जा सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने यादव की सक्रियता की सराहना करते हुए कहा, “हमें गर्व है कि हमारे नागरिक इस कोर्ट में अपनी बात रखने आ रहे हैं।”

कल फिर होगी सुनवाई

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने SIR को “विश्वास की कमी का मुद्दा” करार दिया और कहा कि ड्राफ्ट सूची में त्रुटियों को सुधारा जा सकता है। कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूर्ण डेटा प्रस्तुत करने को कहा, और मामले की सुनवाई बुधवार (13 अगस्त) को भी जारी रहेगी।

योगेंद्र यादव ने अदालत का जताया आभार

योगेंद्र यादव ने अपनी एक्स पोस्ट में कहा, “यह किसी एक राज्य में मतदाता सूची के पुनरीक्षण का मामला नहीं है, बल्कि वयस्क मताधिकार की सार्वभौमिकता को कमज़ोर करने का मामला है। SIR लोकतंत्र की संरचना में एक बड़ा बदलाव है।”

फेसबुक पर उन्होंने लिखा कि सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के मामले में मुझे अपनी दलीलें पेश करने की अनुमति देने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय का आभारी हूँ। और वह भी सामान्य अदालती समय के बाद।
यह किसी एक राज्य में मतदाता सूची के संशोधन का मामला नहीं है, बल्कि वयस्क मताधिकार की सार्वभौमिकता को कमज़ोर करने का मामला है। एसआईआर लोकतंत्र की संरचना में एक बड़ा बदलाव है, किसी भी लोकतंत्र में मताधिकार से वंचित करने की सबसे बड़ी कवायद।
इस असंवैधानिक नीति की धज्जियाँ उड़ाने के लिए कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, वृंदा ग्रोवर, गोपाल शंकरनारायण और शादान फरासत सहित कानूनी टीम पर गर्व है।
यह विशेषाधिकार प्रदान करने के लिए एक बार फिर न्यायालय का आभार।

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