इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की संशोधित वरिष्ठता सूची रद्द, महिला स्टेनोग्राफर की वरिष्ठता बहाल
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी सेवा में वरिष्ठता निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि एक ही चयन प्रक्रिया से नियुक्त प्रत्यक्ष भर्ती कर्मचारियों की वरिष्ठता उनके ज्वाइनिंग के समय (सुबह या दोपहर) से नहीं, बल्कि चयन सूची में प्राप्त मेरिट के आधार पर तय होगी। अदालत ने कहा कि सेवा नियम स्पष्ट होने के बावजूद वरिष्ठता बदलना कानून के अनुरूप नहीं है।
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने कु. भुवनेश्वरी बनाम इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय एवं अन्य तथा इससे संबद्ध संतोष कुमार श्रीवास बनाम राज्य शासन एवं अन्य प्रकरण की सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया।
2014 की नियुक्ति से शुरू हुआ विवाद
मामला खैरागढ़ स्थित इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में वर्ष 2014 में स्टेनोग्राफर के दो पदों पर हुई भर्ती से जुड़ा है। दोनों अभ्यर्थियों, कु. भुवनेश्वरी और संतोष कुमार श्रीवास, की नियुक्ति 16 जुलाई 2014 को एक ही चयन प्रक्रिया के तहत हुई थी।
नियुक्ति आदेश में कु. भुवनेश्वरी का नाम पहले और संतोष कुमार श्रीवास का नाम दूसरे क्रम पर था। परिवीक्षा अवधि पूरी होने के बाद दोनों की सेवाएं नियमित कर दी गईं। वर्ष 2017 में जारी वरिष्ठता सूची में भी भुवनेश्वरी को वरिष्ठ माना गया था।
ज्वाइनिंग के समय के आधार पर बदल दी वरिष्ठता
विवाद तब शुरू हुआ जब विश्वविद्यालय ने अप्रैल 2020 में संशोधित वरिष्ठता सूची जारी कर संतोष कुमार श्रीवास को भुवनेश्वरी से वरिष्ठ घोषित कर दिया। विश्वविद्यालय का तर्क था कि संतोष ने उसी दिन पूर्वाह्न में और भुवनेश्वरी ने अपराह्न में कार्यभार ग्रहण किया था, इसलिए उन्हें वरिष्ठ माना गया।
भुवनेश्वरी ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया। बाद में जून 2023 में विश्वविद्यालय ने फिर नई वरिष्ठता सूची जारी कर भुवनेश्वरी को दोबारा वरिष्ठ स्थान पर बहाल कर दिया। इसके बाद दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट का रुख किया।
मेरिट ही होगी वरिष्ठता का आधार
हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1961 के नियम 12(1)(क) का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्यक्ष भर्ती कर्मचारियों की वरिष्ठता चयन प्रक्रिया में उनकी मेरिट के क्रम से तय होगी, न कि कार्यभार ग्रहण करने के समय से।
अदालत ने कहा कि विश्वविद्यालय यह साबित नहीं कर सका कि संतोष कुमार श्रीवास चयन सूची में भुवनेश्वरी से अधिक मेरिट पर थे। विश्वविद्यालय न तो चयन सूची, न मेरिट सूची और न ही चयन समिति की कार्यवाही अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर सका। ऐसी स्थिति में नियुक्ति आदेश ही सबसे विश्वसनीय दस्तावेज माना जाएगा, जिसमें भुवनेश्वरी का नाम पहले क्रम पर था।
वरिष्ठता बदलने से पहले सुनवाई जरूरी
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वरिष्ठता भले ही मौलिक अधिकार न हो, लेकिन यह कर्मचारी का महत्वपूर्ण सिविल अधिकार है। इसे बदलने से पहले प्रभावित कर्मचारी को नोटिस देना और अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर देना आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना पहले से तय वरिष्ठता सूची में बदलाव करना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना जा सकता।
संशोधित सूची रद्द, पदोन्नति पर भी निर्देश
हाईकोर्ट ने 29 अप्रैल 2020 और 2 जून 2020 की संशोधित वरिष्ठता सूचियों को उस सीमा तक निरस्त कर दिया, जिसमें संतोष कुमार श्रीवास को भुवनेश्वरी से ऊपर रखा गया था।
साथ ही अदालत ने 9 जून 2023 की वरिष्ठता सूची को वैध ठहराते हुए विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि कु. भुवनेश्वरी की वरिष्ठता उसी के अनुसार मानी जाए। यदि वह अन्य सभी शर्तों को पूरा करती हैं, तो उन्हें उनके कनिष्ठ कर्मचारी के पदोन्नत होने की तिथि से रजिस्ट्रार के पर्सनल असिस्टेंट पद पर पदोन्नति के लिए विचार किया जाए। पात्र पाए जाने पर उन्हें काल्पनिक (नोटेशनल) पदोन्नति, वरिष्ठता की निरंतरता तथा अन्य सभी सेवा संबंधी लाभ भी दिए जाएं।
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के तीन माह के भीतर पूरी प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं।














