हाईकोर्ट ने कहा- टेंडर की शर्तें तय करना सरकार का अधिकार, ठोस सबूत के बिना तकनीकी निर्णयों में दखल नहीं देगा न्यायालय

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगभग 2,550 करोड़ रुपये की सिकासार–कोदार जलाशय लिंक कैनाल पाइपलाइन परियोजना की टेंडर शर्तों को चुनौती देने वाली भोपाल की कंपनी एम/एस ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर्स लिमिटेड की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि टेंडर की पात्रता शर्तें तय करना सरकार और निविदा आमंत्रित करने वाले प्राधिकरण का अधिकार है तथा स्पष्ट मनमानी या कानून के उल्लंघन के प्रमाण के बिना न्यायालय तकनीकी मूल्यांकन में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनवाई के बाद यह आदेश पारित किया।

क्या था विवाद

जल संसाधन विभाग ने 13 मई 2026 को गरियाबंद जिले के सिकासार जलाशय से महासमुंद जिले के कोदार जलाशय तक पाइपलाइन लिंक कैनाल के निर्माण, परीक्षण, कमीशनिंग और पांच वर्ष के संचालन एवं रखरखाव के लिए टेंडर जारी किया था।

निविदा की शर्त 1.3 (A) के तहत पिछले पांच वर्षों में किसी एक वर्ष में कम से कम 1,020 करोड़ रुपये के सिविल इंजीनियरिंग कार्य का अनुभव तथा अनुमानित परियोजना लागत के दोगुने, यानी 5,100 करोड़ रुपये के औसत वार्षिक टर्नओवर की पात्रता निर्धारित की गई थी।

याचिकाकर्ता कंपनी ने इस शर्त को मनमाना और प्रतिस्पर्धा को सीमित करने वाला बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की थी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका कि टेंडर की शर्तें पक्षपातपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण या किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से बनाई गई थीं।

अदालत ने यह भी कहा कि अनुमानित लागत के दोगुने वार्षिक टर्नओवर की पात्रता अपने आप में न तो मनमानी है और न ही संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है।

पहले भागीदारी, फिर चुनौती स्वीकार नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कंपनी ने टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने से पहले इन शर्तों को चुनौती नहीं दी थी। प्रक्रिया में शामिल होने और बाद में अपात्र घोषित होने के बाद टेंडर शर्तों पर आपत्ति उठाना स्वीकार्य नहीं है।

अदालत ने दोहराया कि विशेषज्ञ समिति द्वारा किए गए तकनीकी मूल्यांकन में तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक स्पष्ट रूप से मनमानी या कानूनी त्रुटि सिद्ध न हो।

पुराने टेंडरों का दिया था हवाला

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि विभाग की पूर्व परियोजनाओं और सीपीडब्ल्यूडी (CPWD) के मानकों में वित्तीय पात्रता की शर्तें अपेक्षाकृत कम थीं। कंपनी ने जशपुर सिंचाई परियोजना और कबीरधाम के बरोदा टैंक परियोजना का उदाहरण देते हुए कहा कि इस परियोजना में 200 प्रतिशत टर्नओवर की शर्त प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करती है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि टेंडर की शर्तें तय करना सरकार और निविदा प्राधिकरण का नीतिगत निर्णय है।

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