सुप्रीम कोर्ट ने बदला प्रवेश नियम; विधि स्नातकों के लिए बड़ी राहत
बिलासपुर। न्यायिक सेवा में जाने की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की सीधी भर्ती के लिए अनिवार्य कानूनी प्रैक्टिस की अवधि तीन साल से घटाकर एक साल कर दी है। यह फैसला 21 अगस्त को 2:1 के बहुमत से सुनाया गया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की बहुमत पीठ ने मई 2025 के फैसले को पूरी तरह पलटने के बजाय उसमें बदलाव किया है। अब एक साल की सक्रिय वकालत का अनुभव रखने वाले अभ्यर्थी न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल हो सकेंगे। हालांकि चयन के बाद उन्हें सीधे नियमित न्यायिक अधिकारी नहीं बनाया जाएगा।
चयन के बाद दो साल की ट्रेनिंग
चयनित अभ्यर्थियों को पहले एक साल संबंधित राज्य की न्यायिक अकादमी में गहन प्रशिक्षण लेना होगा। इसके बाद एक साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप होगी। इसमें छह महीने प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश या जिला एवं सत्र न्यायाधीश के साथ और शेष छह महीने संबंधित हाईकोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश के साथ काम करना होगा। प्रशिक्षण और क्लर्कशिप के दौरान प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जाएगा।
संतोषजनक मूल्यांकन के बाद ही प्रशिक्षु को नियमित न्यायिक अधिकारी के रूप में नियुक्ति और पूर्ण वेतन व सेवा लाभ मिलेंगे।
मार्च 2027 तक संक्रमणकालीन राहत
अदालत ने मई 2025 से 31 मार्च 2027 तक की संक्रमणकालीन अवधि में होने वाली सिविल जज भर्ती के लिए अलग व्यवस्था की है। इस अवधि में आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों को एक साल की प्रैक्टिस पूरी मानते हुए अलग से प्रैक्टिस प्रमाणपत्र देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।
1 अप्रैल 2027 से एक साल की वास्तविक कानूनी प्रैक्टिस का प्रमाण देना अनिवार्य होगा। प्रमाणपत्र तभी मान्य होगा जब अभ्यर्थी की किसी वरिष्ठ अधिवक्ता के साथ प्रभावी न्यायिक कार्यवाही में उपस्थिति और भागीदारी का रिकॉर्ड उपलब्ध हो।
बहुमत ने कहा कि नई व्यवस्था पांच साल तक चलेगी और इसके प्रभाव की समीक्षा की जाएगी। हालांकि न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने इससे असहमति जताते हुए समीक्षा याचिकाएं खारिज करने के पक्ष में फैसला दिया। उनका कहना था कि नए कानून स्नातकों को न्यायाधीश बनने से पहले अदालतों में कामकाज और मुकदमेबाजों की वास्तविक समस्याओं का अनुभव होना जरूरी है।














