77 वर्षीय निःसंतान विधवा के मामले में हाईकोर्ट का अहम फैसला, कहा- केवल सौतेला रिश्ता maintenance के दावे में बाधा नहीं

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निःसंतान और असहाय सौतेली मां को केवल इस आधार पर भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता कि संबंधित व्यक्ति उसके सौतेले बेटे हैं। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश सिन्हा ने 77 वर्षीय महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका मंजूर करते हुए उसके तीन सौतेले बेटों को कुल ₹9 हजार प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया है।

मामला सनकैया बाई बनाम भीषण प्रसाद एवं अन्य का है। महिला ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत बिलासपुर फैमिली कोर्ट में ₹20 हजार प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग की थी। उसने बताया कि वह दिवंगत पुरुषोत्तम सोनी की कानूनी पत्नी और तीनों प्रतिवादियों की सौतेली मां है। उसके अनुसार, तीनों बेटों का पालन-पोषण उसने बचपन से किया और बालिग होने तक उनकी देखभाल की।

महिला का कहना था कि पति की वर्ष 2021 में मृत्यु के बाद सौतेले बेटों ने उसकी उपेक्षा शुरू कर दी। उसके पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है और वह अपनी विधवा बेटी पर बुनियादी जरूरतों के लिए निर्भर है। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके और दिवंगत पति की कृषि संपत्तियों से प्रतिवादी लाभ उठा रहे हैं, लेकिन उसे भरण-पोषण नहीं दे रहे हैं।

फैमिली कोर्ट ने 5 अप्रैल 2025 को उसकी याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने माना था कि सौतेले बेटे होने के कारण उन पर धारा 144 BNSS के तहत भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। इसके खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के किर्तिकांत डी. वडोदिया बनाम गुजरात राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निःसंतान सौतेली मां विधवा होने या पति के उसे संभालने में असमर्थ होने की स्थिति में सौतेले बेटे से भरण-पोषण मांग सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सौतेली मां और सौतेले बेटे का रिश्ता अपने आप में भरण-पोषण के दावे को खत्म नहीं करता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि मौजूदा मामले में महिला वृद्ध, निःसंतान और विधवा है तथा उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांत इस मामले पर पूरी तरह लागू होता है।

तीनों बेटों को ₹3-₹3 हजार देने का आदेश

परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने तीनों सौतेले बेटों को सितंबर 2026 से ₹3 हजार प्रति माह प्रत्येक, यानी कुल ₹9 हजार प्रतिमाह, देने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि यह राशि मौजूदा परिस्थितियों में न्यायसंगत और उचित है। साथ ही भरण-पोषण की राशि नियमित रूप से बिना चूक के देने के निर्देश दिए गए हैं।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 5 अप्रैल 2025 के आदेश को निरस्त करते हुए महिला की भरण-पोषण याचिका स्वीकार कर ली।

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