याचिकाकर्ता का दावा- मौजूदा PEKB खदान में पर्याप्त कोयला, नई की जरूरत नहीं; पेड़ों और वन क्षेत्र से जुड़ी जानकारी छिपाने का आरोप

बिलासपुर/भोपाल। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में प्रस्तावित केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक की पर्यावरणीय मंजूरी को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच में चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई के बाद एनजीटी ने केंद्र और राज्य सरकार समेत सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। परियोजना पर रोक लगाने की मांग वाली अंतरिम आवेदन पर भी नोटिस जारी किया गया है। मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर को होगी।

यह याचिका बिलासपुर की संस्था ‘नेचर क्लब’ से जुड़े संजीव दत्ता ने दायर की है। याचिका में केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक के लिए दी गई पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देते हुए परियोजना की संवेदनशील वन एवं पारिस्थितिक परिस्थितियों को प्रमुख आधार बनाया गया है।

हसदेव अरण्य की संवेदनशीलता पर जोर

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अग्नेय सेल ने एनजीटी की पीठ को बताया कि हसदेव अरण्य क्षेत्र घने जंगलों और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है। यह इलाका हाथियों समेत कई वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है। वहीं, क्षेत्र में रहने वाली आदिवासी आबादी की आजीविका खेती और वनोपज पर काफी हद तक निर्भर है।

याचिका में कहा गया है कि कोयला खनन से इस पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसके साथ ही यह तर्क भी दिया गया है कि राजस्थान के बिजली संयंत्रों की जरूरत पूरी करने के लिए मौजूदा परसा ईस्ट एंड केते बासन (PEKB) कोयला खदान से पर्याप्त कोयला उपलब्ध हो रहा है। ऐसे में एक नई खदान शुरू करने की आवश्यकता पर सवाल उठाया गया है।

पेड़ों की संख्या को लेकर गंभीर सवाल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया में पेड़ों और वन क्षेत्र से संबंधित जानकारी को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए।

अधिवक्ता ने पीठ को बताया कि सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार प्रस्तावित कोयला ब्लॉक क्षेत्र में करीब 4.48 लाख पेड़ मौजूद हैं। लगभग 1,760 हेक्टेयर क्षेत्र में से 99 प्रतिशत भूमि वन क्षेत्र बताई गई है। याचिका में दावा किया गया है कि परियोजना के लिए लगभग 7 लाख पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है, लेकिन पर्यावरण मंजूरी के आवेदन में पेड़ों की संख्या शून्य दर्शाई गई।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और राजस्थान कोलियरीज लिमिटेड ने पर्यावरण मंजूरी हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया। हालांकि ये आरोप याचिका में लगाए गए हैं और इन पर संबंधित पक्षों का पक्ष मामले की आगे की सुनवाई में सामने आएगा।

पुराने पर्यावरणीय आंकड़ों के इस्तेमाल पर भी आपत्ति

याचिका में पर्यावरण मंजूरी के लिए इस्तेमाल किए गए आंकड़ों की समयावधि पर भी सवाल उठाया गया है। दावा किया गया है कि मंजूरी की प्रक्रिया में तीन साल से अधिक पुराने पर्यावरणीय आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया, जबकि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के नियमों के तहत नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था।

इसी संदर्भ में एनजीटी ने सरगुजा डीएफओ को क्षेत्र में पेड़ों की वास्तविक संख्या के संबंध में स्पष्ट जानकारी प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

लेमरू एलीफेंट रिजर्व से महज तीन किलोमीटर दूर

याचिका में केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक की भौगोलिक स्थिति को भी महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है। इसके अनुसार परियोजना क्षेत्र रामगढ़ पहाड़ियों के नजदीक है और इसकी सीमा लेमरू एलीफेंट रिजर्व से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर है।

याचिकाकर्ता के मुताबिक, इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन (ICFRE) और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) ने इस व्यापक क्षेत्र के संरक्षण की सिफारिश की थी और इसे अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया था। याचिका में आरोप है कि इन महत्वपूर्ण रिपोर्टों को पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया के दौरान उचित रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया।

सभी पक्षों से जवाब मांगा

एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति शिवकुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर चतुर्वेदी शामिल हैं, ने मामले में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम, राजस्थान कोलियरीज लिमिटेड समेत सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है।

परियोजना पर रोक लगाने की मांग वाले आवेदन पर भी संबंधित पक्षों से जवाब मांगा गया है। अब मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर को होगी। उस सुनवाई में पर्यावरण मंजूरी, वन क्षेत्र, पेड़ों की संख्या, इस्तेमाल किए गए पर्यावरणीय आंकड़ों और परियोजना की आवश्यकता से जुड़े मुद्दों पर पक्षों का जवाब महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को लेकर एनजीटी में दायर यह याचिका ऐसे समय में सामने आई है, जब हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन और वन संरक्षण को लेकर लंबे समय से पर्यावरणीय तथा सामाजिक चिंताएं उठती रही हैं। अब इस मामले में एनजीटी की आगे की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया में उठाई गई आपत्तियों का परियोजना पर क्या प्रभाव पड़ता है।

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