क्षतिपूर्ति अधिनियम का हवाला, पिता की मौत के मामले में बेटी को मुआवजे का वैधानिक हक नहीं

बिलासपुर, 14 सितंबर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए शादीशुदा बेटी को वैधानिक ‘आश्रित’ मानने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने श्रम न्यायालय द्वारा नंदा सोनी के पक्ष में दिए गए 6 लाख 12 हजार 360 रुपये के मुआवजे के अवार्ड को निरस्त कर दिया। साथ ही मुआवजे की राशि पर ब्याज और अन्य लाभ के लिए दायर उनकी अपील भी खारिज कर दी गई।

यह फैसला न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने 2 सितंबर 2026 को दो क्रॉस अपीलों की सुनवाई करते हुए सुनाया।

दीवार गिरने से हुई थी कर्मचारी की मौत

मामला सूरज पल्सेस इंडस्ट्रीज से जुड़ा है। मामले के अनुसार, पदुम बहादुर सोनी कथित तौर पर कंपनी में कार्यरत थे। 26 अप्रैल 2015 को काम के दौरान फैक्ट्री की बाउंड्री वॉल गिरने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए और उसी दिन उनकी मौत हो गई।

इसके बाद उनकी पत्नी सूरजी बाई सोनी ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम की धारा 22 के तहत मुआवजे का दावा पेश किया। हालांकि कंपनी ने पदुम बहादुर को अपना कर्मचारी होने से ही इनकार किया था।

मामले की सुनवाई के दौरान 10 मई 2021 को सूरजी बाई की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी शादीशुदा बेटी नंदा सोनी ने खुद को उनकी जगह पक्षकार बनाए जाने की मांग की। कंपनी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अधिनियम के तहत शादीशुदा बेटी को आश्रित नहीं माना जा सकता।

श्रम न्यायालय ने दिया था 6.12 लाख का मुआवजा

श्रम न्यायालय ने मई 2022 में नंदा सोनी को मामले में प्रतिस्थापित करने की अनुमति दी। बाद में 13 सितंबर 2022 को 6,12,360 रुपये और 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश पारित किया गया।

इसके खिलाफ कंपनी ने हाई कोर्ट में अपील की। वहीं नंदा सोनी ने भी मुआवजा, ब्याज और पेनल्टी बढ़ाने की मांग करते हुए अपील दायर की।

हाई कोर्ट ने कानून की परिभाषा को माना निर्णायक

हाई कोर्ट ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम की धारा 2(1)(d) का परीक्षण किया, जिसमें ‘आश्रित’ की कानूनी परिभाषा दी गई है। कोर्ट ने पाया कि इस प्रावधान में अविवाहित बेटी को आश्रित की श्रेणी में शामिल किया गया है, जबकि शादीशुदा बेटी के लिए केवल कानून में निर्धारित सीमित परिस्थितियों में ही प्रावधान है।

कोर्ट ने पाया कि नंदा सोनी निर्विवाद रूप से शादीशुदा थीं और ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे वह कानून में दिए गए अपवादों के तहत आश्रित की श्रेणी में आती हों।

दावा लंबित रहते मां की मौत से बेटी को नहीं मिला अधिकार

हाई कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत मुआवजे का दावा करने का अधिकार मृत कर्मचारी के वैधानिक ‘आश्रितों’ तक सीमित है। कोर्ट के अनुसार, यदि सूरजी बाई के जीवित रहते उनके पक्ष में मुआवजे का अवार्ड पारित हो गया होता, तो वह राशि उनकी संपत्ति का हिस्सा बन सकती थी और नंदा कानूनी प्रतिनिधि के तौर पर उस पर दावा कर सकती थीं।

लेकिन यहां मूल दावेदार की मृत्यु अवार्ड पारित होने से पहले हो गई। ऐसी स्थिति में दावा नंदा सोनी के पक्ष में आगे जारी नहीं रह सकता, क्योंकि वह अधिनियम की धारा 2(1)(d) के तहत ‘आश्रित’ नहीं हैं।

कंपनी की अपील मंजूर, मुआवजा आदेश निरस्त

हाई कोर्ट ने कानूनी प्रश्न का उत्तर दावेदार के खिलाफ देते हुए श्रम न्यायालय के 13 सितंबर 2022 के फैसले और अवार्ड को निरस्त कर दिया।

कोर्ट ने M/s Suraj Pulses Industries की MAC No. 1494/2022 अपील स्वीकार कर ली, जबकि नंदा सोनी की मुआवजा बढ़ाने संबंधी MAC No. 1311/2022 अपील खारिज कर दी।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि श्रम न्यायालय में जमा मुआवजे की राशि और उस पर अर्जित ब्याज को कानूनी सत्यापन के बाद कंपनी को वापस किया जाए।

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