पूछा-सरेंडर करने वाले कई माओवादियों ने अपराध कबूल किया, उन्हें किस आधार पर बख्शा गया?
रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में 2013 के झीरम घाटी नरसंहार मामले में 17 सितंबर 2026 को जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने 10 माओवादियों को फांसी की सजा सुनाई। इस फैसले के बाद पीड़ित परिवारों में संतोष की बजाय असंतोष ज्यादा दिखा। मारे गए कांग्रेस नेता और सलवा जुडूम के प्रमुख चेहरे महेंद्र कर्मा की बेटी तुलिका ने इस सजा को अधूरा बताया। इंडियन एक्सप्रेस की 18 सितंबर की रिपोर्ट में उनकी प्रतिक्रिया प्रमुखता से छपी है।
हमला और अदालती फैसला
25 मई 2013 को बस्तर के झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया था। इस हमले में 27 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश, पूर्व विपक्ष के नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ल और पूर्व विधायक उदय मुदलियार शामिल थे। कई सुरक्षाकर्मी भी शहीद हुए।
13 साल बाद 5 सितंबर को अदालत ने 10 आरोपियों को दोषी ठहराया और 16-17 सितंबर को सजा सुनाई। फांसी की सजा पाने वाले हैं- प्रमिला मोदियाम, चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना, सुमिता उर्फ पुनेम मोदियाम, मुक्का मांडवी, कोसा कवासी उर्फ कोसाराम, आयाता मारकाम, मडकमी देवा, जोगा मडकमी, बंजामी सन्ना उर्फ चमरू और महादेव नाग। एक आरोपी मुकदमे के दौरान मर चुका है, जबकि 28 अभी भी वांटेड हैं।
तूलिका कर्मा की तीखी प्रतिक्रिया
इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए तूलिका कर्मा ने साफ कहा, “हम तब भी संतुष्ट नहीं थे और अब भी नहीं हैं। हम अभी भी सुरक्षित नहीं हैं। ज्यादातर सरेंडर किए नक्सली, जैसे पापा राव, ने वीडियो इंटरव्यू में कहा था कि वे हमले में शामिल थे। क्या वे अब बिल्कुल बरी हो जाएंगे? कोई बताए कि सरेंडर करने वालों को दोषियों की सूची से किस आधार पर हटा दिया गया?”
उन्होंने बरसे देवा (सरेंडर किए गए बटालियन-1 कमांडर) का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने हमले को अंजाम दिया था। तुलिका ने कहा, “भाजपा सरकार सच छिपाना चाहती है इसलिए उन्हें बचा रही है। ये टॉप नक्सली उनकी गोद में बैठे हैं, फिर भी उनसे सवाल क्यों नहीं किए जा रहे?” उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह, उनके पूरे मंत्रिमंडल और उस समय के डीजी से एसपी तक के अधिकारियों का नार्को टेस्ट कराने की मांग भी की।
आरोपियों के परिवारों का पक्ष
दोषियों के परिवार भी फैसले से नाखुश हैं। कोसा कवासी के भाई गुड्डू ने दावा किया कि उनके भाई और मुक्का मांडवी को झूठा फंसाया गया। उन्होंने कहा कि हमले के समय दोनों शादी की तैयारियों में व्यस्त थे। “जिनकी असल भूमिका थी वे सरेंडर कर आजाद घूम रहे हैं, जबकि निर्दोष सजा भुगत रहे हैं। परिवार टूटे हुए हैं,” गुड्डू ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा। दोषियों के वकील ने हाईकोर्ट में अपील करने का ऐलान किया है।
सरकार का रुख और बड़े सरेंडर
गृह मंत्री विजय शर्मा ने कहा कि राज्यों की सरेंडर नीति के तहत फैसले लिए गए थे। एक सरकारी अधिकारी ने स्पष्ट किया कि सरेंडर का मतलब मुकदमे वापस लेना नहीं है। जिला स्तरीय समिति मामले की गंभीरता देखकर सिफारिश करती है, फिर पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग के जरिए कैबिनेट उप-समिति तक पहुंचता है। केंद्रीय कानूनों वाले मामलों में केंद्र की मंजूरी भी जरूरी होती है।
वांटेड सूची में रहे प्रमुख माओवादियों में थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवूजी (फरवरी में तेलंगाना में सरेंडर) और बरसे देवा (जनवरी में सरेंडर) शामिल हैं। गणेश उइके एनकाउंटर में मारे जा चुके हैं।
अधूरे न्याय का सवाल
यह फैसला न्याय की दिशा में एक कदम जरूर है, लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए पर्याप्त नहीं। महेंद्र कर्मा सलवा जुडूम के चेहरे थे, जिन्हें माओवादियों ने निशाना बनाया था। उनकी बेटी की प्रतिक्रिया दर्शाती है कि सिर्फ निचले स्तर के कैडरों की सजा से बड़े मास्टरमाइंड और सरेंडर किए नेताओं पर सवाल बाकी हैं। मुकदमा 294 सुनवाइयों के बाद पूरा हुआ, लेकिन कई नाम अभी भी सूची से गायब हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट इस असंतोष को साफ उजागर करती है। झीरम घाटी का जख्म अभी भी हरा है। सजा सुनाई गई, लेकिन पूर्ण न्याय की राह अभी बाकी है।













