बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक सहवास की बहाली से जुड़े मामले में कहा है कि केवल पति-पत्नी के अलग रहने के आधार पर पत्नी को पति के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत को यह भी देखना होगा कि पत्नी के अलग रहने के पीछे कोई पर्याप्त और उचित कारण था या नहीं।

जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को साथ रहने का निर्देश देने से इनकार किया गया था।

पत्नी ने लगाए मारपीट और दहेज मांग के आरोप

मामले में दोनों का विवाह 7 फरवरी 2022 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। पति के अनुसार अक्टूबर 2022 तक वैवाहिक संबंध सामान्य थे। 19 अक्टूबर को पत्नी की मां की तबीयत खराब होने की जानकारी मिलने पर उसने पत्नी को उसके मायके छोड़ा था।

पति का कहना था कि इसके बाद वह 23 अक्टूबर, 31 अक्टूबर, 7 नवंबर और 11 नवंबर को पत्नी को वापस लाने गया। उसके माता-पिता भी 24 नवंबर को उसे वापस लाने गए, लेकिन पत्नी ने लौटने से इनकार कर दिया।

दूसरी ओर पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे पति और ससुराल पक्ष की ओर से प्रताड़ना और शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा। उसने यह भी आरोप लगाया कि शादी के बाद क्रेटा कार और पांच लाख रुपये की मांग की गई थी। पत्नी ने अपनी शिकायतों और घरेलू हिंसा से जुड़ी कार्यवाही का भी उल्लेख किया।

गर्भपात और दस्तावेज रोकने का भी आरोप

पत्नी ने आरोप लगाया कि मारपीट और प्रताड़ना के कारण उसका गर्भपात हुआ। उसने जशपुर के सखी सेंटर सहित विभिन्न स्तरों पर शिकायत किए जाने की जानकारी दी। इसके अलावा उसका आरोप था कि पति ने उसके शैक्षणिक प्रमाणपत्र, आधार कार्ड, जाति प्रमाणपत्र और बैंक पासबुक अपने पास रख लिए हैं।

पति की ओर से इन आरोपों को गलत और बाद में लगाए गए आरोप बताया गया। उसका कहना था कि वह वैवाहिक संबंध जारी रखना चाहता था और पत्नी को वापस लाने के लिए उसने कई प्रयास किए।

धारा 9 में उचित कारण की जांच जरूरी

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 9 के तहत सवाल केवल यह नहीं है कि पत्नी पति से अलग रह रही है या नहीं। यह भी तय करना जरूरी है कि उसने पर्याप्त और उचित कारण के बिना पति का साथ छोड़ा है या नहीं।

अदालत ने कहा कि पत्नी की ओर से लगाए गए प्रताड़ना, शारीरिक हिंसा, दहेज की मांग और गर्भपात से जुड़े आरोपों को मामले की पूरी परिस्थितियों के साथ देखा जाना चाहिए। अदालत ने पत्नी के शैक्षणिक और अन्य दस्तावेज पति के पास होने के तथ्य को भी प्रासंगिक माना।

बेंच ने यह भी कहा कि पति का पत्नी के मायके जाकर उसे वापस लाने का प्रयास करना या साथ रहने की इच्छा जताते हुए कानूनी नोटिस भेजना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पत्नी के वापस नहीं लौटने का कोई उचित कारण नहीं था।

फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार

मामले के सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया। अदालत ने पति की अपील खारिज करते हुए धारा 9 के तहत दायर उसका आवेदन अस्वीकार किए जाने का फैसला बरकरार रखा।

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