बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गर्भपात कराने के आरोप से जुड़े एक मामले में  कहा है कि केवल महिला के गर्भवती होने और बाद में गर्भपात होने से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन को यह भी साबित करना होगा कि गर्भपात आरोपी के किसी कृत्य के कारण हुआ और वह महिला की सहमति के बिना कराया गया था। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

मेडिकल रिपोर्ट में प्राकृतिक कारण की संभावना भी

मामला वर्ष 2013 का है। अभियोजन के अनुसार महिला की शादी किसी अन्य व्यक्ति से हुई थी और वह आरोपी के पड़ोस में रहती थी। महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का भरोसा देकर करीब एक साल तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद वह गर्भवती हो गई। महिला का कहना था कि शादी के लिए दबाव बनाने पर आरोपी ने इनकार कर दिया और बाद में उसे ऐसी गोलियां दीं, जिससे उसका गर्भपात हो गया।

मेडिकल जांच में महिला करीब 10 से 12 सप्ताह की गर्भवती पाई गई थी और गर्भपात की प्रक्रिया चल रही थी। हालांकि डॉक्टर ने यह भी कहा था कि गर्भपात स्वाभाविक रूप से या किसी बाहरी कारण से हो सकता है।

महिला ने माना, दोनों के बीच प्रेम संबंध था

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान महिला के बयान और जिरह में सामने आई बातों को भी ध्यान में रखा। महिला ने स्वीकार किया था कि वह विवाहित थी और आरोपी के साथ उसके प्रेम संबंध थे। उसने यह भी माना कि दोनों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बने थे और यह संबंध करीब एक वर्ष तक जारी रहा।

अदालत ने यह भी नोट किया कि महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने से पहले अपने माता-पिता को गर्भावस्था के बारे में नहीं बताया था। कथित गर्भपात की दवाएं या उनका मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन भी पुलिस को उपलब्ध नहीं कराया गया था।

अभियोजन जरूरी कड़ी जोड़ने में रहा असफल

अदालत ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य से गर्भपात की पुष्टि होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह साबित करना जरूरी था कि गर्भपात आरोपी के कृत्य के कारण हुआ और महिला की सहमति के बिना हुआ। दोनों तथ्यों को संदेह से परे साबित किया जाना आवश्यक था।

मामले में आरोपी को मई 2016 में ट्रायल कोर्ट ने तीन वर्ष के कठोर कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों में आवश्यक कड़ी नहीं मिलने पर ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

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