शारीरिक दिव्यांगता कानूनी कार्रवाई में बाधा नहीं; मानसिक अक्षमता साबित होने पर ही नियुक्त हो सकता है ‘नेक्स्ट फ्रेंड’
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सुनने और बोलने में असमर्थ होना किसी व्यक्ति को अपने कानूनी अधिकारों के लिए लड़ने से वंचित नहीं करता। केवल शारीरिक दिव्यांगता के आधार पर किसी व्यक्ति की ओर से अदालत में पैरवी करने के लिए दूसरे व्यक्ति को उसका कानूनी प्रतिनिधि नियुक्त नहीं किया जा सकता। जरूरत पड़ने पर लिखकर, इशारों से या दुभाषिए की मदद से अपनी बात अदालत तक पहुंचाई जा सकती है।
जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की सिंगल बेंच ने 30 अक्टूबर को जगदलपुर की एक महिला की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने निचली अदालत के 4 अगस्त 2022 के आदेश को बरकरार रखा।
1.21 हेक्टेयर जमीन को लेकर विवाद
मामला जगदलपुर निवासी अबेदा बानो के नाम दर्ज 1.21 हेक्टेयर जमीन से जुड़ा है। दंतेवाड़ा निवासी राजेश और सुनीता सुराना ने इस जमीन पर अपना दावा पेश किया है। उनका कहना है कि वर्ष 2010 में जमीन का सौदा 12.08 लाख रुपये में तय हुआ था और उन्होंने अग्रिम के रूप में 5 लाख रुपये भी दिए थे।
दावेदारों के मुताबिक, शेष रकम देने की पेशकश के बावजूद जमीन की रजिस्ट्री नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने अदालत में समझौते के पालन और रजिस्ट्री कराने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया।
दूसरी ओर, अबेदा बानो और उनके पति ने अलग मुकदमा दायर कर 2010 के इस समझौते को रद्द करने की मांग की।
पति को ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ बनाने की मांग
इसी मुकदमे के दौरान अबेदा बानो ने अदालत में आवेदन देकर अपने पति को ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ नियुक्त करने की मांग की। महिला का कहना था कि वह जन्म से सुनने और बोलने में असमर्थ हैं, इसलिए खुद अदालत में अपना पक्ष रखने में परेशानी होती है। ऐसे में उनके पति को उनकी ओर से कानूनी कार्यवाही करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
पढ़ी-लिखी हैं महिला, संपत्ति के लेन-देन का भी अनुभव
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि महिला पढ़ी-लिखी हैं और पहले भी संपत्ति से जुड़े कई वित्तीय लेन-देन कर चुकी हैं। उनके पास पैन कार्ड है और अदालत की कार्यवाही के दौरान वकील भी उनकी ओर से पैरवी कर रहे हैं।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में महिला की मानसिक अक्षमता का कोई प्रमाण नहीं है। इसके विपरीत, वह मानसिक रूप से सक्षम हैं। ऐसे में केवल सुनने और बोलने में असमर्थ होने के आधार पर उनके पति को ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ नियुक्त करने का औचित्य नहीं बनता।
लिखकर या इशारों से भी रख सकती हैं अपना पक्ष
अदालत ने स्पष्ट किया कि बोलने में असमर्थ व्यक्ति लिखकर या इशारों के माध्यम से अपनी बात बता सकता है। जरूरत पड़ने पर दुभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता भी ली जा सकती है। महिला अपने वकील को लिखकर या इशारों के जरिए निर्देश दे सकती हैं।
सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 32 नियम 15 के तहत ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ की नियुक्ति का प्रावधान मानसिक अक्षमता जैसी स्थिति में लागू होता है। पति संवाद स्थापित करने में सहायता कर सकते हैं, लेकिन इससे उन्हें स्वतः महिला का ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ बनने का अधिकार नहीं मिल जाता।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर महिला की याचिका खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।














