दो अहम चश्मदीद गवाहों का नहीं मिला अभियोजन को साथ, न हथियारों से गोलियों का मिलान हुआ और न संपत्ति विवाद साबित कर सकी पुलिस
बिलासपुर। संजू त्रिपाठी हत्याकांड में सभी 22 आरोपियों के बरी होने के बाद अब पुलिस की पूरी जांच प्रक्रिया सवालों के घेरे में है। करीब 1500 पन्नों की चार्जशीट, उत्तर प्रदेश से शूटर बुलाने की कहानी और संपत्ति विवाद को हत्या की साजिश की वजह बताने के बावजूद अभियोजन अदालत में आरोप साबित नहीं कर सका। दसवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश आदित्य जोशी की अदालत ने साक्ष्यों की कमी को देखते हुए संजू के भाई कपिल त्रिपाठी व पिता जयनारायण त्रिपाठी समेत सभी 22 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
फैसले के बाद सामने आए तथ्यों से पता चलता है कि पुलिस की जांच में कई ऐसी कमजोरियां थीं, जिनका फायदा बचाव पक्ष को मिला। चश्मदीद गवाहों के मुकरने से लेकर इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की प्रमाणिकता और हथियारों से गोलियों का मिलान नहीं होने तक कई सवाल अभियोजन के सामने खड़े हुए।
दो अहम चश्मदीद गवाहों ने कमजोर कर दी अभियोजन की कहानी
पुलिस ने मोहम्मद सरफराज और मोनिश खंडेलकर को हत्याकांड का अहम चश्मदीद बताया था। लेकिन सुनवाई के दौरान इनमें से एक गवाह अदालत में पेश ही नहीं हुआ, जबकि दूसरे ने अभियोजन के पक्ष में गवाही नहीं दी। इससे हत्या की साजिश और आरोपियों की भूमिका साबित करने की पुलिस की कोशिश को बड़ा झटका लगा।
चश्मदीदों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के बाद अभियोजन को तकनीकी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के सहारे आरोपियों के बीच संबंध और उनकी कथित भूमिका साबित करनी थी। लेकिन ये साक्ष्य भी अदालत में आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं रहे।
कितनी गोलियां चलीं, पुलिस यह भी साफ नहीं कर सकी
इस हत्याकांड की जांच में सबसे गंभीर सवाल गोलीबारी और बैलिस्टिक रिपोर्ट को लेकर उठे। पुलिस की शुरुआती कहानी के मुताबिक 13 राउंड फायर किए गए थे, लेकिन संजू के शरीर से केवल तीन गोलियां मिलने की बात सामने आई।
इसके बाद अंतिम संस्कार के तीन दिन बाद अस्थियां एकत्र करने के दौरान पुलिस ने छह और गोलियां बरामद करने का दावा किया। बचाव पक्ष ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए बरामदगी की परिस्थितियों को संदिग्ध बताया।
सबसे अहम बात यह रही कि पुलिस बरामद हथियारों और घटनास्थल से मिले कारतूसों तथा गोलियों के बीच ऐसा निर्णायक संबंध स्थापित नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो सके कि हत्या में उन्हीं हथियारों का इस्तेमाल हुआ था। गोलीबारी की वास्तविक संख्या और पुलिस के दावों के बीच भी सवाल बने रहे।
मोबाइल लोकेशन और कॉल रिकॉर्ड की प्रमाणिकता पर सवाल
पुलिस ने आरोपियों के बीच संपर्क और साजिश की कड़ियां जोड़ने के लिए कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), मोबाइल टावर लोकेशन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेश किए थे। बचाव पक्ष ने इनकी वैधानिक प्रमाणिकता को चुनौती दी।
दलील दी गई कि दूरसंचार कंपनियों के अधिकृत अधिकारियों से जरूरी प्रमाणपत्र प्राप्त किए बिना इन रिकॉर्ड को प्रमाणिक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नहीं माना जा सकता। केवल मोबाइल लोकेशन या कॉल रिकॉर्ड के आधार पर किसी व्यक्ति को हत्या की साजिश में शामिल साबित नहीं किया जा सकता।
15 घंटे बाद मिला डॉक्टर का मृत्यु संबंधी मेमो
घटना के बाद पुलिस की शुरुआती कार्रवाई भी सवालों में रही। 14 दिसंबर 2022 को शाम करीब 4.15 बजे संजू की हत्या के बाद पहले मर्ग कायम किया गया और बाद में इसे हत्या के अपराध में बदला गया।
शुरुआती सूचना संजू की पत्नी किरण त्रिपाठी के बयान के आधार पर दर्ज की गई थी। बचाव पक्ष ने सवाल उठाया कि अस्पताल से डॉक्टर का आधिकारिक मेडिकल मेमो प्राप्त किए बिना मर्ग की कार्रवाई कैसे शुरू कर दी गई। डॉक्टर की ओर से मृत्यु की पुष्टि करने वाला मेमो करीब 15 घंटे बाद जारी किया गया था।
इस पहलू को भी बचाव पक्ष ने जांच की प्रक्रिया और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया।
संपत्ति विवाद का आधार भी साबित नहीं कर सकी पुलिस
पुलिस ने हत्या के पीछे पारिवारिक और संपत्ति विवाद को मुख्य वजह बताया था। जांच में संजू के भाई कपिल त्रिपाठी को कथित साजिश का मुख्य आरोपी बताया गया। पुलिस का दावा था कि लंबे समय से चल रही रंजिश और संपत्ति को लेकर विवाद के कारण हत्या की योजना बनाई गई।
लेकिन बचाव पक्ष ने इस कहानी की बुनियाद पर ही सवाल खड़े कर दिए। उसका तर्क था कि पुलिस जिस संपत्ति को लेकर विवाद होने की बात कह रही थी, उसके अस्तित्व और विवाद को ही ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं कर सकी।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि किसी व्यक्ति से दुश्मनी या संपत्ति को लेकर विवाद होना अपने आप में हत्या की साजिश का प्रमाण नहीं है। इसके लिए ऐसे ठोस और आपस में जुड़े साक्ष्य जरूरी हैं, जो आरोपियों की भूमिका को स्पष्ट रूप से साबित करें।
यूपी से शूटर बुलाने का दावा, लेकिन साजिश की कड़ियां नहीं जुड़ीं
14 दिसंबर 2022 को सकरी बायपास स्थित खनिज बैरियर के पास संजू त्रिपाठी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय वह अपनी सफेद MG Hector कार में सवार थे। दिनदहाड़े हुई इस वारदात से पूरे शहर में सनसनी फैल गई थी।
पुलिस ने दावा किया था कि हत्या को अंजाम देने के लिए उत्तर प्रदेश से शूटर बुलाए गए थे और स्थानीय लोगों ने उनकी मदद की थी। जांच में बनारस, चित्रकूट और गाजीपुर से जुड़े कुछ लोगों के नाम भी सामने आए थे। हथियारों की सप्लाई करने वाले व्यक्ति की भूमिका भी बताई गई थी।
हालांकि, पुलिस की इस पूरी कहानी को अदालत में साबित करने लायक साक्ष्य नहीं मिल सके।
ये गवाह थे अभियोजन के लिए अहम
मामले में संजू की पत्नी किरण त्रिपाठी के अलावा मंगल केशरवानी, स्वर्णिम तिवारी, हरीश श्रीवास, सुहेल जेम्स, पोस्टमार्टम करने वाले CIMS अस्पताल के डॉक्टर राहुल अग्रवाल और साइबर सेल के उप निरीक्षक प्रभाकर तिवारी सहित कई लोगों के बयान महत्वपूर्ण थे।
लेकिन चश्मदीदों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने और तकनीकी साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर उठे सवालों ने अभियोजन की स्थिति कमजोर कर दी।
शूटरों की भूमिका पर भी नहीं बन सका दोषसिद्धि का आधार
पुलिस के मेमो में उत्तर प्रदेश के जिन लोगों को शूटर और हथियार सप्लायर बताया गया था, उनमें बनारस के दानिश अंसारी, एजाज अंसारी उर्फ ऐज उर्फ सोनू, पप्पू दाढ़ी, चित्रकूट के विनय द्विवेदी उर्फ गुरुजी और गाजीपुर के तबीज अंसारी उर्फ इरफान अहमद के नाम शामिल थे। दानिश को मुख्य शूटर और तबीज को हथियार सप्लायर बताया गया था।
इनमें से कुछ की गिरफ्तारी नहीं हो सकी थी। पुलिस की कहानी में इन लोगों की भूमिका अहम थी, लेकिन मुख्य आरोपियों के खिलाफ भी साजिश और हत्या के आरोप अदालत में साबित नहीं हो पाए।
बड़ी जांच, लंबी चार्जशीट, लेकिन नतीजा शून्य
इस मामले में पुलिस ने शुरुआत से ही पारिवारिक विवाद और सुपारी देकर हत्या कराने की थ्योरी पर जांच आगे बढ़ाई थी। उत्तर प्रदेश के शूटरों से लेकर स्थानीय मददगारों तक की कड़ियां जोड़ने का दावा किया गया। करीब 1500 पन्नों की चार्जशीट भी पेश हुई।
इसके बावजूद अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि हत्या किसने की, किसने साजिश रची और किन लोगों ने किस भूमिका में मदद की। अदालत ने इसी आधार पर सभी 22 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
दिनदहाड़े हुई एक चर्चित हत्या के मामले में इतनी लंबी जांच और भारी-भरकम चार्जशीट के बावजूद दोषसिद्धि नहीं हो पाना पुलिस के लिए निश्चित रूप से बड़ा झटका है।














