बिलासपुर। झीरम घाटी नक्सली हमले की जांच के लिए गठित दूसरे न्यायिक जांच आयोग के खिलाफ भाजपा विधायक धरमलाल कौशिक की याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अब 21 दिसंबर 2026 को अंतिम सुनवाई होगी। चीफ जस्टिस कृष्ण राम महापात्र और जस्टिस संतोष शर्मा की डिवीजन बेंच ने बुधवार को सुनवाई के दौरान माना कि इस मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सवाल जुड़े हुए हैं। इसलिए सभी पक्षों को विस्तार से सुनने की जरूरत है।

दूसरे आयोग के गठन को दी गई थी चुनौती

झीरम घाटी कांड की जांच के लिए पहले न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा की अध्यक्षता में आयोग गठित किया गया था। बाद में न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त किए जाने के कारण आयोग की कार्यवाही प्रभावित हुई।

इस बीच पहले आयोग ने अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंप दी। हालांकि तत्कालीन राज्य सरकार ने रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद वर्ष 2021 में सरकार ने दो सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों न्यायमूर्ति सतीश अग्निहोत्री और न्यायमूर्ति मिन्हाजुद्दीन की अध्यक्षता में नया न्यायिक जांच आयोग गठित कर दिया।

2022 से लगी हुई है जांच पर रोक

उस समय भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे कौशिक ने सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि जब पहले आयोग ने जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंप दी है तो दोबारा आयोग गठित करने की जरूरत ही क्या है।

मई 2022 में हाईकोर्ट ने दूसरे आयोग की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। यह अंतरिम रोक अब तक जारी है। लिहाजा नया आयोग गठन के बावजूद अपनी जांच शुरू नहीं कर सका है।

कांग्रेस की हस्तक्षेप याचिका में अलग तर्क

इस मामले में जीरम घाटी घटना से जुड़े एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने हस्तक्षेप याचिका दाखिल की है। उनकी ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने बुधवार को डिवीजन बेंच के सामने कहा कि राज्य सरकार को नया जांच आयोग गठित करने का पूरा अधिकार है। खासकर तब, जब पहले आयोग में रिक्तता आ जाए या जांच के लिए नए बिंदु सामने आएं।

उन्होंने दलील दी कि दूसरे आयोग को पहले आयोग से अलग और नए बिंदुओं की जांच का जिम्मा दिया गया है। ऐसे में इसे पहले आयोग की जांच दोहराने की कार्रवाई नहीं माना जा सकता। उन्होंने कौशिक की याचिका को सुनवाई योग्य नहीं बताते हुए खारिज करने और दूसरे आयोग की कार्यवाही पर लगी रोक हटाने की मांग की।

सरकार ने मांगा निर्देश लेने का समय

बुधवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता की अनुपलब्धता का हवाला देकर समय मांगा गया। वहीं राज्य सरकार के वकील ने मामले में आवश्यक निर्देश प्राप्त करने के लिए मोहलत मांगी।

डिवीजन बेंच ने हस्तक्षेपकर्ता के अधिवक्ता को भी अपना पक्ष रखने की अनुमति दी और स्पष्ट किया कि मामले में गंभीर कानूनी सवाल हैं, जिन पर विस्तृत सुनवाई जरूरी है। अब 21 दिसंबर को होने वाली अंतिम सुनवाई में यह तय करने की दिशा में बहस होगी कि सरकार को दूसरे जांच आयोग के गठन का अधिकार था या नहीं और उस पर लगी रोक जारी रहनी चाहिए अथवा हटाई जानी चाहिए।

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