कोर्ट ने कहा फायरिंग करने वालों में शामिल होने का आरोप साबित नहीं
बिलासपुर। नारायणपुर की रहने वाली 24 वर्षीय मांगो उर्फ सिंधु नुरेटी को पुलिस पर जानलेवा हमला, अवैध हथियार रखने और प्रतिबंधित माओवादी संगठन की गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों से बरी कर दिया गया है। बिलासपुर की NIA विशेष अदालत के न्यायाधीश सिराजुद्दीन कुरैशी ने मामले में फैसला सुनाया।
अदालत ने पाया कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि मांगो नुरेटी पुलिस टीम पर हुई फायरिंग में शामिल थी। उसके पहचान संबंधी साक्ष्य, ओडिशा पुलिस द्वारा उसे सौंपे जाने की प्रक्रिया, चोटों और हथियार बरामदगी से जुड़े साक्ष्यों में भी कमियां सामने आईं।
12 अप्रैल 2024 की मुठभेड़ का मामला
अभियोजन के अनुसार 12 अप्रैल 2024 को एकावरी के जंगल में धमतरी DRG, गरियाबंद DRG और STF की संयुक्त टीम माओवादी विरोधी अभियान पर गई थी। शाम करीब 4:30 से 5:30 बजे के बीच 20 से 25 माओवादियों के समूह ने पुलिस टीम पर घात लगाकर फायरिंग की।
पुलिस की जवाबी कार्रवाई के दौरान माओवादी जंगल और अंधेरे का फायदा उठाकर भाग गए। मौके से BGL शेल, सोलर प्लेट, बिजली के तार, माओवादी वर्दी, साहित्य और दवाइयां बरामद होने का दावा अभियोजन ने किया था। मुठभेड़ में STF आरक्षक सोढ़ी हिंगा के घायल होने की बात भी सामने रखी गई थी।
ओडिशा पुलिस से सौंपे जाने की कहानी पर भी सवाल
पुलिस के अनुसार मुठभेड़ के बाद मांगो नुरेटी के पैर में गोली लगी थी और वह एकावरी गांव में अर्जुन लाल मरकाम के घर में छिपी थी। 20 अप्रैल 2024 को ओडिशा पुलिस की DVF-SOG टीम ने उसे वहां से पकड़कर छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंपा था।
हालांकि अदालत में इस कहानी के समर्थन में पेश साक्ष्य कमजोर पाए गए। पुलिस और ग्रामीणों की ओर से भी इस दावे की पुष्टि नहीं हुई। मुठभेड़ में शामिल DRG और STF के किसी गवाह ने अदालत में यह नहीं कहा कि उन्होंने घटनास्थल पर मांगो नुरेटी को देखा था या उसकी पहचान की थी।
इन्हीं परिस्थितियों में अदालत ने अभियोजन के आरोपों को पर्याप्त रूप से सिद्ध नहीं मानते हुए मांगो नुरेटी को दोषमुक्त कर दिया।














