-राजेश अग्रवाल
बीजेपी को इसलिये जाना जाता है कि उनके मामूली से मामूली कार्यकर्ता सहित शीर्ष पर बैठे नेता पार्टी के दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं। नए विधायकों को तौर-तरीका समझाने के लिए शिविर भी लगाए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी 2023 के नतीजों के बाद ऐसा किया गया था। मगर, सुशासन तिहार के दौरान घटे दो मामले बताते हैं कि ट्रेनिंग में कुछ कमी रह गई।
सरगुजा जिले के राजपुर में नायब तहसीलदार तुषार माणिक की सीतापुर विधायक ने पिटाई कर दी। आरोप है कि विधायक की चचेरी बहन सीमा, पैरोल से संबंधित एक दस्तावेज पर दस्तखत कराने के लिए पहुंची थी, पर नायब तहसीलदार ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया, महिला होने के बावजूद नरमी से बात करने के बजाय अभद्र व्यवहार किया और उसे स्टाफ को बोलकर धक्का देकर बाहर कर दिया। इस घटना की खबर मिलते ही विधायक टोप्पो घटनास्थल पहुंचे। खबरों के मुताबिक विधायक और उनके समर्थकों ने उनको गाड़ी से खींच लिया, कपड़े फाड़े और लात-घूंसों से पिटाई की। मौके पर मौजूद एसडीएम फगेश सिन्हा ने पुलिस में ऐसा ही बयान दिया है। दोनों पक्षों ने क्रास एफआईआर दर्ज कराई है। राजस्व अधिकारियों ने विधायक की गिरफ्तारी की मांग की है। विधायक ने कहा है कि मैं खुद गिरफ्तारी देने जाऊंगा क्योंकि अफसरों का रवैया सहन से बाहर है। शायद इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वे थाने में मौजूद मिलें। कल भी वे गिरफ्तारी देने गए थे, मगर समर्थकों ने उनको रोक लिया था।
दूसरी घटना दुर्ग ग्रामीण इलाके के थनौद गांव की है। दुर्ग ग्रामीण के विधायक ललित चंद्राकर के साथ जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी रूपेश पांडेय दुर्व्यवहार कर रहे हैं। उंगली दिखाकर कह रहे हैं कि मेरा क्या बिगाड़ लोगे, तेरे को जो करना है कर ले। कुछ पोस्ट कह रहे हैं कि यह बातचीत विधायक से नहीं है, उनके साथ के कार्यकर्ता से है। पर, पक्की बात यह है कि विधायक वहां मौजूद थे। पता नहीं, रूपेश पांडेय सीजीपीएससी से पासआउट हैं या फिर व्यवस्था के तहत बिठाए गए हैं। कई जगह पर बाबू लेवल के लोग भी सीईओ बने बैठे हैं, यहां तक कि तृतीय श्रेणी के कर्मचारी भी। तहसीलदार और पटवारी विधायक की गिरफ्तारी के लिए सड़क पर उतरे हैं लेकिन प्रायः आम लोग इनसे त्रस्त हैं और उनको समर्थन नहीं मिलता है।
सत्तारूढ़ भाजपा के इनजनप्रतिनिधियों की बात आगे करेंगे लेकिन पहले अफसरों की संवैधानिक सुरक्षा की चर्चा कर लें।
बता दें कि उनमें इतनी अकड़ क्यों होती है। संविधान का अनुच्छेद 311 सरकारी कर्मचारियों को सुरक्षा की गारंटी देता है। यदि वह एसटी, एससी वर्ग से है तो आसानी से जांच भी नहीं बैठ सकती। इनकी गलतियां छोटी-मोटी मानकर माफ कर दी जाती है। यदि वे ऑन ड्यूटी हैं तो एफआईआर नहीं हो सकती। कोर्ट में परिवाद जरूर दायर कर सकते हैं। सीआरपीसी की धारा 197 के तहत उन्हें सुरक्षा मिली हुई है। अन्य मामलों में शिकायत होने पर विभागीय जांच होती है। उनको अपना पक्ष रखने के लिए कम से कम 90 दिन का समय मिलता है। इस बीच वह चाहे तो अपनी गलती मान सकता है। इसके चलते रियायत यह होगी कि उसकी- गंभीर मामलों मे एक या दो वेतनवृद्धि रोक दी जाएगी। मगर नौकरी बची रहेगी। वेतन वृद्धि को रोकने के खिलाफ वह अपील भी कर सकता है और पहले की पुरानी तनख्वाह हासिल कर सकता है। ये सब जांच प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी होती है कि रिटायरमेंट तक कोई फैसला नहीं होता। बड़ा अफसर, छोटे अफसरों को बचा लेता है। कहते हैं कि नोटिस और कार्रवाई के दौरान अच्छा-खासा लेन-देन भी होता है।
ऐसी शिकायतों पर कार्रवई के नाम पर निलंबन को भी बोलें तो मजे की कार्रवाई है। घर बैठे आधी तनख्वाह मिल जाती है। जांच यदि 6 महीने में पूरी नहीं हुई, जो अक्सर नहीं होती तो सातवें महीने से कर्मचारी या अधिकारी दो तिहाई वेतन के हकदार हो जाते हैं।
तो यह मानकर चलें कि सूरजपुर के नायब तहसीलदार और दुर्ग के सीईओ पर कार्रवाई तो होगी, पर उनकी नौकरी दांव पर नहीं लगी है। हमारी-आपकी और सत्तारूढ़ भाजपा विधायकों की मजबूरी समझिये।
अब थोड़ा पीछे चलते हैं। 2025 में 7 जुलाई से जुलाई तक बीजेपी के नवनिर्वाचित विधायकों का एक सम्मलेन हुआ था। यह सम्मेलन मैनपाट के तिब्बती मोनेस्ट्री हॉल में रखा गया था। 44 विधायक और सभी छत्तीसगढ़ के सांसद इसमें शामिल हुए थे। क्या-क्या सलाह दी गई? पार्टी के भीतर किसी भी तरह की गुटबाजी पर सख्त रोक होगी, आपसी बयानबाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को बढ़-चढ़कर प्रचारित करेंगे। जनता से सीधे संवाद करें। और अंतिम बात मीडिया और जनता के सामने अपनी बात रखते समय एक मर्यादा रखेंगे। सभी विधायक अपने-अपने इलाकों में निरंतर आम जनता से संवाद करते रहें और सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम छोर के व्यक्ति को मिले, इसका ध्यान रखें। जुलाई 2025 की उस मैनपाट वाली बैठक में भाजपा के दिग्गज शिवराज सिंह चौहान भी शामिल हुए थे। मगर, पूरी बैठक में नहीं बताया गया कि सरकारी अफसर अकड़ दिखाएगा तो उससे कैसे निपटेंगे।
सुशासन तिहार के दौरान हुई दुर्ग और सूरजपुर की घटनाएं बताती हैं कि विधायकों ने जनता से सीधे संवाद बंद कर रखा है। ऐसे गुबार का फूटना बताता है कि वे विधायक के तौर पर मिली सुविधाओं के आदी हो चुके हैं। इसका फायदा बेलगाम अफसर उठा रहे हैं, जो उन पर आंखें तरेर रहे हैं।














