सुकमा पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित पूर्व नक्सलियों से संवाद, जगरगुंडा में शहादत की स्मृतियां देखीं; केरलापेंदा में 21 साल बाद खुले श्रीराम मंदिर और पूवर्ती में हिडमा के परिवार से मिले

रायपुर, 30 सितंबर। बस्तर को लंबे समय तक नक्सल हिंसा, सुरक्षा चुनौतियों और भय के संदर्भ में देखा जाता रहा है। अब इसी क्षेत्र में सुरक्षा, पुनर्वास, ग्रामीण जीवन और विकास से जुड़े बदलावों को करीब से समझने के लिए दिल्ली से आए 43 इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा से जगरगुंडा, केरलापेंदा और पूवर्ती तक का दौरा किया। करीब 13 घंटे से अधिक चली इस यात्रा में उन्होंने आत्मसमर्पित पूर्व नक्सलियों से संवाद किया, सुरक्षा व्यवस्था और विकास कार्यों की जानकारी ली, नक्सल हिंसा से जुड़े क्षेत्रों का दौरा किया और ग्रामीणों से बातचीत की।

यात्रा के दौरान दल ने केरलापेंदा में करीब 21 वर्षों तक बंद रहे श्रीराम मंदिर का भी दौरा किया। इसके बाद देर रात पूवर्ती पहुंचकर नक्सली कमांडर रहे हिडमा के परिवार के सदस्यों से बातचीत की। यात्रा के अलग-अलग पड़ावों ने बस्तर में हिंसा के दौर की स्मृतियों के साथ मौजूदा परिस्थितियों को भी समझने का अवसर दिया।

पुनर्वास केंद्र में पूर्व नक्सलियों से बातचीत

सुकमा पहुंचने के बाद इंफ्लुएंसर्स ने सबसे पहले पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने आत्मसमर्पण कर हिंसा का रास्ता छोड़ चुके पूर्व नक्सलियों से बातचीत की। उन्होंने आत्मसमर्पण के बाद उनके जीवन में आए बदलाव, मुख्यधारा में लौटने के अनुभव और वर्तमान जीवन के बारे में जानकारी ली।

इसके बाद दल ने सुकमा के पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की। इस दौरान क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक पहुंच, शांति और विकास से जुड़े प्रयासों के बारे में जानकारी दी गई। इंफ्लुएंसर्स ने यह समझने की कोशिश की कि दूरस्थ इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था के साथ नागरिक सुविधाओं और विकास कार्यों की पहुंच किस तरह बढ़ रही है।

सुकमा में दल ने साइंस पार्क का भी भ्रमण किया। इसके बाद तोंगपाल होते हुए जगरगुंडा की ओर रवाना हुआ।

‘खूनी सड़क’ और ताड़मेटला की स्मृतियां

जगरगुंडा की यात्रा के दौरान दल उस मार्ग से गुजरा, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘खूनी सड़क’ के नाम से जाना जाता है। इस इलाके में नक्सल हिंसा के दौर की कई घटनाओं की स्मृतियां जुड़ी हैं।

जगरगुंडा क्षेत्र में इंफ्लुएंसर्स को 6 अप्रैल 2010 के ताड़मेटला हमले की जानकारी भी दी गई। इस हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों की मौत हुई थी। इस दौरान उन्हें क्षेत्र में रही सुरक्षा चुनौतियों और उस दौर की परिस्थितियों के बारे में बताया गया।

21 साल बाद फिर खुले मंदिर के दरवाजे

जगरगुंडा से आगे दल केरलापेंदा पहुंचा। यहां ग्रामीणों से बातचीत के दौरान उन्होंने क्षेत्र में आए बदलावों के बारे में जाना। इसके बाद उन्होंने श्रीराम मंदिर का दौरा किया, जो करीब 21 वर्षों तक बंद रहा था।

बताया गया कि वर्ष 2003 में माओवादी प्रभाव के दौरान ग्रामीणों को मंदिर बंद रखने और वहां पूजा नहीं करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद लंबे समय तक मंदिर में धार्मिक गतिविधियां बंद रहीं।

अप्रैल 2024 में परिस्थितियां बदलने के बाद सुरक्षा बलों और ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर परिसर की सफाई की गई। इसके बाद मंदिर में भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना फिर शुरू हुई।

मंदिर का यह प्रसंग बस्तर में लंबे समय तक चले संघर्ष के बीच सामान्य सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों की वापसी का एक उदाहरण है। केरलापेंदा को वर्ष 2025 में 9 सहित कुल 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद माओवादी मुक्त गांव घोषित किए जाने की जानकारी भी इंफ्लुएंसर्स को दी गई।

पूवर्ती में हिडमा के परिवार से संवाद

इसके बाद दल पूवर्ती के लिए रवाना हुआ। कई घंटे की यात्रा के बाद रात में पूवर्ती पहुंचकर इंफ्लुएंसर्स ने हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने गांव की वर्तमान स्थिति, स्थानीय जीवन और क्षेत्र में हुए बदलावों के बारे में जानकारी ली।

यह मुलाकात यात्रा के अन्य पड़ावों से अलग थी। जहां एक ओर हिडमा का नाम नक्सल हिंसा से जुड़ा रहा है, वहीं उसके पैतृक गांव में उसके परिवार से बातचीत के जरिए दल ने इस क्षेत्र के सामाजिक पक्ष को समझने का प्रयास किया।

एक यात्रा में अतीत और वर्तमान से सामना

सुकमा के पुनर्वास केंद्र से शुरू हुई यह यात्रा जगरगुंडा की शहादत की स्मृतियों, केरलापेंदा के ग्रामीण जीवन और दोबारा शुरू हुई पूजा तथा पूवर्ती में हुई बातचीत तक पहुंची। इस दौरान बस्तर के संघर्ष के दौर से जुड़े कई पहलुओं को समझने के साथ मौजूदा परिस्थितियों को भी करीब से देखने का अवसर मिला।

इंफ्लुएंसर्स के लिए यह दौरा केवल पर्यटन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने उन क्षेत्रों में जाकर लोगों से बातचीत की, जिनकी पहचान लंबे समय तक नक्सल हिंसा की घटनाओं से जुड़ी रही। पुनर्वास केंद्र में मुख्यधारा में लौटे लोगों से संवाद, सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी, ग्रामीणों से बातचीत और केरलापेंदा के मंदिर का दौरा इस यात्रा के प्रमुख पड़ाव रहे।

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