आईएमडी ने घटाया पूर्वानुमान; सामान्य से केवल 90% बारिश की संभावना
नई दिल्ली। देश में इस वर्ष मानसून को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने अपने पूर्व अनुमान में संशोधन करते हुए कहा है कि जून से सितंबर के बीच होने वाली मानसूनी बारिश सामान्य से कम रह सकती है। नए अनुमान के अनुसार देश को इस बार दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का केवल 90 प्रतिशत वर्षा मिलने की संभावना है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो भारत 2015 के बाद सबसे कमजोर मानसून का सामना करेगा।
आईएमडी ने अप्रैल में जारी अपने पहले पूर्वानुमान में मानसून के दौरान 92 प्रतिशत वर्षा होने की संभावना जताई थी। लेकिन शुक्रवार को जारी संशोधित अनुमान में इसे घटाकर 90 प्रतिशत कर दिया गया। मौसम विभाग का कहना है कि मानसून के सामान्य से कम रहने की संभावना 60 प्रतिशत है।
पिछले दो दशकों में बेहद कम वर्षा वाले वर्षों की श्रेणी में शामिल हो सकता है 2026
पिछले 20 वर्षों में केवल 2009, 2014 और 2015 ऐसे वर्ष रहे हैं जब मानसूनी वर्षा एलपीए के 90 प्रतिशत से नीचे रही थी। 2015 में देश को केवल 86 प्रतिशत वर्षा मिली थी। इस बार भी हालात उसी दिशा में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
भारत के लिए सामान्य मानसून का मानक 89 सेंटीमीटर वर्षा है, जिसे 1971 से 2020 के बीच दर्ज वर्षा के 50 वर्षीय औसत के आधार पर तय किया गया है।
अल नीनो बना सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों के अनुसार पूर्वानुमान में कटौती की सबसे बड़ी वजह प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा अल नीनो है। अल नीनो एक जलवायु घटना है जो वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है और सामान्यतः भारत में मानसूनी वर्षा को कमजोर करती है।
आईएमडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अप्रैल में अल नीनो की तीव्रता और समय को लेकर अनिश्चितता थी। अब उपलब्ध नए आंकड़ों से संकेत मिल रहे हैं कि अल नीनो अपेक्षा से पहले और अधिक शक्तिशाली रूप में विकसित हो सकता है। जून में इसके कमजोर, जुलाई-अगस्त में मध्यम और सितंबर में मजबूत रहने की संभावना जताई गई है।
भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD) से भी नहीं मिलेगी राहत
मौसम वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि भारतीय महासागर द्विध्रुव (आईओडी) सकारात्मक अवस्था में पहुंचकर अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक कम करेगा। लेकिन अब आईएमडी ने अपने आकलन में बदलाव करते हुए कहा है कि आईओडी पूरे मानसून सीजन में तटस्थ अवस्था में रह सकता है। इससे वर्षा को अतिरिक्त समर्थन मिलने की संभावना कम हो गई है।
लगातार अच्छे मानसून का सिलसिला टूट सकता है
पिछले सात वर्षों में से पांच वर्षों में देश को सामान्य से अधिक वर्षा मिली थी। 2021 में 99 प्रतिशत और 2023 में 95 प्रतिशत वर्षा दर्ज की गई थी, जबकि हाल के दो वर्षों में बारिश 100 प्रतिशत से भी अधिक रही। ऐसे में इस वर्ष कम बारिश का अनुमान एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
तत्काल संकट नहीं, लेकिन खतरे बरकरार
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कम बारिश के बावजूद तत्काल खाद्यान्न संकट की आशंका नहीं है। पिछले वर्ष अच्छी फसल और पर्याप्त जल भंडारण के कारण देश के प्रमुख जलाशयों में पर्याप्त पानी मौजूद है। खरीफ फसलों की बुआई पर भी सीमित असर पड़ने की संभावना है क्योंकि अल नीनो का प्रभाव मानसून के दूसरे हिस्से में अधिक दिखाई देता है।
फिर भी कम वर्षा का असर तापमान, जल उपलब्धता और रबी फसलों पर पड़ सकता है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि जून में देश के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।
मानसून भारत की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा प्रदान करता है। कृषि, पेयजल, बिजली उत्पादन और उद्योगों की बड़ी जरूरतें इसी पर निर्भर करती हैं। ऐसे में मानसून का कमजोर पड़ना अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन दोनों के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन सकता है।














