राष्ट्रीय पहचान का महत्व बढ़ा, निजी संग्रहालय में दुर्लभ ताम्रपत्र बना सुरक्षित
बिलासपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 134वें संस्करण में जब बिलासपुर जिले के ऐतिहासिक नगर मल्हार में सुरक्षित एक प्राचीन ताम्रपत्र का उल्लेख किया, तो पूरे छत्तीसगढ़ में गर्व और उत्साह की लहर दौड़ गई। सदियों पुराने इतिहास को अपने भीतर समेटे यह ताम्रपत्र लंबे समय से स्वर्गीय रघुनंदन प्रसाद पांडेय के निजी संग्रहालय में संरक्षित है और अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
मल्हार पहले से ही अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक पहचान के लिए प्रसिद्ध रहा है। प्रधानमंत्री के उल्लेख के बाद इस विरासत को नई पहचान मिली है। खास बात यह है कि इस ताम्रपत्र की खोज भी किसी पुरातात्विक खुदाई में नहीं, बल्कि एक किसान के खेत में हुई थी।
साल 1987 में मल्हार से लगे जुनवानी गांव में एक किसान खेत की जुताई कर रहा था। इसी दौरान उसे मिट्टी के भीतर दबा यह दुर्लभ ताम्रपत्र मिला। किसान ने इसे तत्कालीन सरपंच डॉ. अहमद हसन खान हाजी को सौंप दिया। पुरातत्व विभाग की जांच और पंजीयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद 18 जनवरी 1988 को इसे मल्हार स्थित निजी संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया। बाद में विद्वानों ने इसका अध्ययन किया और वर्ष 1994 में ‘पुरातन’ पत्रिका के विशेषांक में इसका प्रथम प्रकाशन हुआ।
यह ताम्रपत्र तीन तांबे की पट्टिकाओं से मिलकर बना है, जिन्हें एक धातु की अंगूठी और राजकीय मुद्रा से जोड़ा गया है। लगभग 2.9 किलोग्राम वजनी इस अभिलेख पर कुल 41 पंक्तियां अंकित हैं। ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा में लिखे गए इस दस्तावेज को पांडुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल का महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है। इसमें उनके शासन के 57वें वर्ष का उल्लेख मिलता है, जो इसे उस काल का सबसे बाद का ज्ञात अभिलेख बनाता है।
ताम्रपत्र में तत्कालीन भूमि दान, उसकी सीमाओं, माप की पद्धति, गुरु-शिष्य परंपरा तथा सोमवंशी शासन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य दर्ज हैं। इतिहासकारों के अनुसार यह दस्तावेज उस समय की सामाजिक, धार्मिक और प्रशासनिक व्यवस्था को समझने का महत्वपूर्ण आधार है।
प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय मंच पर इसका उल्लेख किए जाने के बाद मल्हार और बिलासपुर में खुशी का माहौल है। संग्रहालय के संरक्षक संजीव पांडेय को देशभर से बधाइयां मिल रही हैं। वहीं सागर विश्वविद्यालय की पुरातात्विक उत्खनन टीम के वरिष्ठ सदस्य रहे डॉ. के.के. त्रिपाठी ने भी इसे छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए पांडेय परिवार को शुभकामनाएं दीं।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि लगभग 1500 से 1600 वर्ष पुराने ये ताम्रपत्र छत्तीसगढ़ के गौरवशाली अतीत के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी धरोहरें आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों और इतिहास से जोड़ने का काम करती हैं। राज्य सरकार पुरातात्विक विरासत के संरक्षण और शोध को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।
कलेक्टर संजय अग्रवाल ने भी इसे बिलासपुर जिले के लिए सम्मान का विषय बताया। उन्होंने कहा कि ‘ज्ञान भारतम अभियान’ के माध्यम से जिले में ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरावशेषों के संरक्षण का कार्य लगातार किया जा रहा है। मल्हार का यह ताम्रपत्र शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री साबित होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस ताम्रपत्र के विस्तृत अध्ययन से प्राचीन भारत की सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक जीवन और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं। प्रधानमंत्री के उल्लेख ने न केवल इस खोज को राष्ट्रीय पहचान दिलाई है, बल्कि पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण के प्रति लोगों की जागरूकता भी बढ़ाई है।
आज मल्हार की यह ऐतिहासिक धरोहर केवल एक पुरातात्विक खोज नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और गौरवशाली इतिहास का जीवंत प्रमाण बनकर देश-दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही है।














