नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 18 वर्ष पुराने विवाह को समाप्त करते हुए कहा है कि बिना उचित कारण पति या पत्नी द्वारा लंबे समय तक वैवाहिक संबंधों और शारीरिक निकटता से इनकार करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में शारीरिक और भावनात्मक निकटता केवल अधिकार नहीं, बल्कि दोनों पक्षों की साझा जिम्मेदारी भी है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें एक चिकित्सक पति को क्रूरता के आधार पर तलाक प्रदान किया गया था। अदालत ने कहा कि भारतीय न्यायालय लगातार यह मानते रहे हैं कि शारीरिक संबंधों से निरंतर दूरी या इनकार जीवनसाथी को गंभीर भावनात्मक पीड़ा पहुंचा सकता है और विवाह की बुनियाद को कमजोर कर सकता है।
मामले में पति-पत्नी दोनों डॉक्टर हैं। उनका विवाह 5 दिसंबर 2007 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। पत्नी उस समय गुजरात के एक सरकारी अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत थीं, जबकि पति राजस्थान में सरकारी सेवा में थे। पति का आरोप था कि पत्नी ने विवाह के बाद केवल दो से तीन माह ही उनके साथ वैवाहिक घर में निवास किया और इस दौरान भी सामान्य दांपत्य जीवन नहीं अपनाया।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों के अनुसार, साथ रहने की अल्प अवधि में भी पत्नी अलग कमरे में रहती थीं। पति ने बताया कि पत्नी कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लेती थीं और उनके बुलाने पर भी नहीं खोलती थीं, जिसके कारण उन्हें अलग कमरे में सोना पड़ता था। न्यायालय ने पाया कि पत्नी ने इस तथ्य का स्पष्ट खंडन भी नहीं किया।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि दोनों पक्ष पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से अलग-अलग रह रहे हैं। उनके कोई संतान नहीं है और इतने लंबे समय में संबंध सुधारने की कोई संभावना भी नहीं बची। विभिन्न अदालतों द्वारा सुलह कराने के प्रयास किए गए, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह केवल व्यक्तिगत अधिकारों का अनुबंध नहीं है, बल्कि सम्मान, विश्वास, भावनात्मक सहयोग और साझा जिम्मेदारियों पर आधारित सामाजिक संस्था है। यदि कोई पक्ष अपने वैवाहिक दायित्वों का लगातार निर्वहन नहीं करता, तो उसका कानूनी प्रभाव पड़ सकता है।
पीठ ने यह भी कहा कि यद्यपि पति ने औपचारिक रूप से परित्याग (डेजर्शन) का आधार नहीं उठाया था, लेकिन तथ्य बताते हैं कि दोनों ने अपने-अपने पेशेवर और भौगोलिक जीवन अलग-अलग चुन लिए थे और 15 वर्षों तक संबंध पुनर्स्थापित करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। ऐसे में यह स्थिति वैवाहिक संबंध के वास्तविक परित्याग जैसी बन गई थी।
अदालत ने माना कि संबंध पूरी तरह टूट चुका है और पुनर्मिलन की कोई संभावना नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विवाह को समाप्त कर दिया। अदालत ने कहा कि मृतप्राय हो चुके संबंध को केवल कानूनी रूप से जीवित बनाए रखना दोनों पक्षों की निराशा और मानसिक तनाव को बढ़ाने का कारण बनेगा।
यह फैसला ‘सोनल तलपड़े बनाम वीरभान सिंह’ मामले में 2 जून 2026 को सुनाया गया।














