फैसले नहीं करेगा AI, सिर्फ सहायक की भूमिका निभाएगा; छत्तीसगढ़ समेत सभी राज्यों के हाईकोर्ट को भेजा गया मसौदा
नई दिल्ली। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते उपयोग के बीच सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक व्यवस्था में इसके इस्तेमाल को लेकर एक महत्वपूर्ण मसौदा नियमावली जारी की है। “रेगुलेशंस फॉर यूज ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इन कोर्ट्स, 2026” नामक इस ड्राफ्ट का उद्देश्य अदालतों में AI के जिम्मेदार और नियंत्रित उपयोग के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करना है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मसौदे पर छत्तीसगढ़ सहित देश के सभी हाईकोर्टों, न्यायिक संस्थाओं, विधि विशेषज्ञों और आम नागरिकों से 20 जून 2026 तक सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की हैं।
AI करेगा मदद, लेकिन फैसला नहीं
प्रस्तावित नियमों के अनुसार AI का उपयोग कानूनी शोध, दस्तावेजों के मसौदे तैयार करने, अनुवाद, ट्रांसक्रिप्शन, केस प्रबंधन और प्रशासनिक कार्यों में किया जा सकेगा। हालांकि किसी भी मामले में न्यायिक निर्णय लेने, जमानत तय करने, सजा निर्धारित करने या न्यायिक परिणामों को प्रभावित करने के लिए AI का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। अंतिम निर्णय और उसकी जिम्मेदारी संबंधित न्यायिक अधिकारी की ही होगी।
मानवीय विवेक सर्वोपरि रहेगा
मसौदा नियमों में “ह्यूमन प्राइमेसी” यानी मानवीय निर्णय को सर्वोच्च महत्व देने का सिद्धांत अपनाया गया है। इसमें पारदर्शिता, जवाबदेही, डेटा सुरक्षा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को भी प्रमुख आधार बनाया गया है। AI को केवल एक सहायक तकनीक माना गया है, जो न्यायिक कार्यों की दक्षता बढ़ाने में मदद करेगी।
हर हाईकोर्ट में बन सकती है AI निगरानी समिति
प्रस्तावित ढांचे में सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ प्रत्येक हाईकोर्ट में AI के उपयोग की निगरानी और नियमन के लिए विशेष समितियों के गठन का भी सुझाव दिया गया है। इन समितियों का काम AI के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग को सुनिश्चित करना होगा।
क्यों पड़ी नियम बनाने की जरूरत?
हाल के वर्षों में AI द्वारा गलत या काल्पनिक न्यायिक उद्धरण (फर्जी केस लॉ) तैयार करने जैसी घटनाओं ने चिंता बढ़ाई है। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट नियम बनाने की पहल की है, ताकि तकनीक का लाभ लिया जा सके लेकिन न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर कोई आंच न आए।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम भारत की न्यायिक व्यवस्था में AI के उपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण नीति पहल माना जा रहा है, जिसके दूरगामी प्रभाव देशभर की अदालतों पर पड़ सकते हैं।














