बलरामपुर के जंगल में सुबह-सुबह हुआ हादसा, मानव-हाथी संघर्ष फिर बना चिंता का कारण
बलरामपुर। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में मंगलवार सुबह एक जंगली हाथी ने ग्रामीण दंपती को कुचलकर मार डाला। घटना के बाद गांव में दहशत का माहौल है। राज्य में पिछले तीन दिनों के भीतर हाथियों के हमले में चार लोगों की मौत हो चुकी है, जिससे मानव-हाथी संघर्ष का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
जानकारी के अनुसार घटना राजपुर वन परिक्षेत्र के कुंडी गांव के पास स्थित जंगल में सुबह करीब पांच बजे हुई। जुठन गोंड (65) और उनकी पत्नी सुंदरी बाई (55) गांव के निकट जंगल क्षेत्र में गए थे। इसी दौरान उनका सामना एक हाथी से हो गया, जो कल्याणपुर वन क्षेत्र में विचरण कर रहे पांच हाथियों के दल से अलग होकर गांव की ओर आ गया था।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हाथी ने अचानक हमला कर दोनों को पटक दिया और कुचल दिया। हमले में पति-पत्नी की मौके पर ही मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही ग्रामीणों ने वन विभाग को जानकारी दी। इसके बाद वन अमला मौके पर पहुंचा और शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।
वन विभाग ने मृतकों के परिजनों को तत्काल सहायता के रूप में 25-25 हजार रुपये देने की घोषणा की है। शेष 5.75 लाख रुपये की अनुग्रह राशि आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद प्रदान की जाएगी।
गौरतलब है कि इससे पहले रविवार रात मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के गुरु घासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व क्षेत्र में सड़क निर्माण कार्य में लगे दो मजदूरों की भी हाथी के हमले में मौत हो गई थी। लगातार हो रही इन घटनाओं ने वन क्षेत्रों से लगे गांवों में रहने वाले लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
वन अधिकारियों का कहना है कि हाथियों की गतिविधियों को लेकर नियमित रूप से ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है। गांवों में बैठकें आयोजित कर लोगों को सुरक्षा संबंधी सावधानियां भी बताई जा रही हैं। इसके बावजूद हाथियों की बढ़ती आवाजाही और आबादी वाले क्षेत्रों में उनके प्रवेश से खतरा बना हुआ है।
उत्तर छत्तीसगढ़ के सरगुजा, बलरामपुर, सूरजपुर, जशपुर, कोरबा और रायगढ़ जिले लंबे समय से मानव-हाथी संघर्ष की समस्या से जूझ रहे हैं। हाल के वर्षों में यह समस्या प्रदेश के अन्य इलाकों तक भी फैलने लगी है।
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच वर्षों में छत्तीसगढ़ में हाथियों के हमलों में 325 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों के सिकुड़ते दायरे और हाथियों के पारंपरिक मार्गों में बढ़ते हस्तक्षेप के कारण ऐसे हादसे लगातार बढ़ रहे हैं।














