पुनरीक्षण याचिका खारिज करने का आदेश रद्द, राजस्व मंडल को गुण-दोष के आधार पर दोबारा सुनवाई के निर्देश

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया और समय-सीमा (लिमिटेशन) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि दूरस्थ वन क्षेत्रों में रहने वाले गरीब और अशिक्षित आदिवासी पूरी तरह अपने वकीलों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे लोगों द्वारा अपील या पुनरीक्षण याचिका समय पर दाखिल नहीं कर पाने को केवल “घोर लापरवाही” मानकर न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विलंब माफी संबंधी कानून का उद्देश्य तकनीकी आधार पर अधिकार छीनना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है।

न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने इस टिप्पणी के साथ बिलासपुर स्थित राजस्व मंडल के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें सात माह की देरी से दायर पुनरीक्षण याचिका को सुनवाई योग्य मानने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने प्रकरण को वापस राजस्व मंडल भेजते हुए सभी पक्षों को सुनकर गुण-दोष के आधार पर नया निर्णय देने के निर्देश दिए हैं।

तहसीलदार के आदेश से शुरू हुआ विवाद

मामला बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के मरियमपारा गांव के 68 वर्षीय कोड़िया उरांव सहित सात ग्रामीणों से जुड़ा है। ग्रामीण लंबे समय से अपने बनाए मकानों में रह रहे थे। उनके विरुद्ध तहसीलदार ने बेदखली की कार्रवाई शुरू की थी।

इस आदेश के खिलाफ ग्रामीणों ने सरगुजा संभाग आयुक्त की अदालत में अपील दायर की, लेकिन 21 जुलाई 2025 को आयुक्त न्यायालय ने तहसीलदार के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।

घर तोड़ने पहुंचे प्रशासन से मिली फैसले की जानकारी

ग्रामीणों का कहना था कि वे अशिक्षित हैं और दूरस्थ क्षेत्र में रहते हैं। इसलिए उन्हें आयुक्त न्यायालय के फैसले की जानकारी ही नहीं मिल सकी। जनवरी 2026 में जब प्रशासन उनके मकान तोड़ने पहुंचा, तब उन्हें पहली बार इस आदेश का पता चला।

इसके बाद उन्होंने 19 जनवरी 2026 को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त की और बिलासपुर राजस्व मंडल में पुनरीक्षण याचिका दायर की। चूंकि याचिका सात माह की देरी से दाखिल हुई थी, इसलिए उन्होंने विलंब माफी का आवेदन भी प्रस्तुत किया।

राजस्व मंडल ने कहा- वकील से जानकारी लेते रहना चाहिए था

9 मार्च 2026 को राजस्व मंडल ने यह कहते हुए विलंब माफी का आवेदन खारिज कर दिया कि ग्रामीणों ने अपने वकील से मुकदमे की स्थिति जानने का प्रयास नहीं किया, इसलिए देरी उनकी लापरवाही का परिणाम है।

राजस्व मंडल के इस आदेश को ग्रामीणों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने कहा- न्याय का उद्देश्य अधिकारों की रक्षा करना

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि सभी ग्रामीण आदिवासी समुदाय से हैं, आर्थिक रूप से कमजोर और अशिक्षित हैं। वे पूरी तरह अपने अधिवक्ता पर निर्भर थे। जैसे ही उन्हें बेदखली की कार्रवाई की जानकारी मिली, उन्होंने तत्काल आदेश की प्रति लेकर कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी।

वहीं, राज्य शासन की ओर से तर्क दिया गया कि सात माह की देरी के लिए पर्याप्त कारण प्रस्तुत नहीं किया गया है। साथ ही ग्रामीण सरकारी भूमि पर अतिक्रमणकारी हैं, इसलिए राजस्व मंडल का आदेश उचित है।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि विलंब माफी संबंधी प्रावधानों का मूल उद्देश्य न्याय करना है, न कि तकनीकी कारणों से किसी को उसके अधिकार से वंचित करना। अदालत ने माना कि केवल यह कहना कि ग्रामीणों ने वकील से नियमित जानकारी नहीं ली, उन्हें घोर लापरवाह नहीं ठहराया जा सकता।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राजस्व मंडल का आदेश रद्द करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि सभी पक्षों को सुनने के बाद कानून के अनुसार अंतिम निर्णय लिया जाए।

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