बिलासपुर, 25 जून। जांजगीर-चांपा जिले के गोधन गांव में एक मकान में आयोजित प्रार्थना सभा से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को अंतरिम राहत प्रदान की है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर रिट अपील पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ के 24 मार्च 2026 के आदेश के प्रभाव और क्रियान्वयन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ता अपने घर में बड़ी संख्या में लोगों को एकत्र कर प्रार्थना सभा आयोजित कर रहे थे, जबकि इसके लिए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना आवश्यक था। सरकार का कहना था कि छत्तीसगढ़ सार्वजनिक धार्मिक भवन एवं स्थल विनियमन अधिनियम, 1984 के तहत ऐसी अनुमति अनिवार्य है। इसके बावजूद एकलपीठ ने संबंधित नोटिस निरस्त करते हुए याचिका स्वीकार कर ली थी।

राज्य सरकार ने यह भी बताया कि इस मामले में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ पहले बीएनएसएस की धारा 130 के तहत कार्रवाई की गई थी। गिरफ्तारी के बाद उन्हें निजी मुचलके पर रिहा कर दिया गया। बाद में धार्मिक परिवर्तन से संबंधित आरोपों के आधार पर बीएनएस की धारा 299 के तहत अपराध दर्ज किया गया। इस मामले में आरोप-पत्र भी प्रस्तुत किया जा चुका है और जुलाई 2026 में आरोप तय किए जाने की प्रक्रिया प्रस्तावित है।

दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि इस मामले में 1984 का अधिनियम लागू नहीं होता। उन्होंने अपने पक्ष के समर्थन में विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णयों का भी हवाला दिया।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा कि एकलपीठ ने राज्य सरकार से औपचारिक जवाब तलब किए बिना तथा दोनों पक्षों के बीच विस्तृत प्रतिवाद की प्रक्रिया पूरी किए बिना याचिका स्वीकार कर ली थी। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि 1984 के अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका भी हाईकोर्ट में लंबित है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए खंडपीठ ने 24 मार्च 2026 को पारित एकलपीठ के आदेश के प्रभाव और उसके क्रियान्वयन पर अगली सुनवाई तक अंतरिम रोक लगाने का आदेश दिया।

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