बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले दो वयस्कों के बीच बने शारीरिक संबंधों को केवल इसलिए दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता कि बाद में पुरुष ने विवाह करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पूरे रिश्ते की प्रकृति, उसकी अवधि और दोनों पक्षों के आचरण को देखा जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक महिला द्वारा दायर उस अपील को खारिज करते हुए की, जिसमें निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी।

अदालत ने क्या कहा

हाईकोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े भविष्य में विवाह की इच्छा जता सकते हैं, लेकिन केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि शारीरिक संबंध सिर्फ शादी के वादे के कारण बने थे। यदि दोनों वयस्क अपनी इच्छा से लंबे समय तक साथ रहे हैं और रिश्ते के परिणामों से परिचित थे, तो संबंध को सहमति पर आधारित माना जाएगा।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि आज महिलाएं आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र हैं। ऐसे मामलों में अदालतों को संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने के बजाय पूरे संबंध, उसकी अवधि और दोनों पक्षों के व्यवहार का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए।

क्या था मामला

मामले की शिकायतकर्ता भिलाई स्थित एक सरकारी संस्थान में अधिकारी हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि वर्ष 2019 में IIM रायपुर में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उनकी आरोपी से मुलाकात हुई। आरोपी ने शादी का भरोसा दिया, जिसके बाद दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने और वे लगभग दो वर्ष तक साथ रहे।

महिला का कहना था कि एमबीए पूरा होने के बाद आरोपी विवाह की बात टालने लगा। बाद में उसने बताया कि महिला के तलाकशुदा, उम्र में बड़ी और ईसाई होने के कारण उसके परिवार को यह रिश्ता स्वीकार नहीं था। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 28 नवंबर 2021 को आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए। इसके बाद दिसंबर 2022 में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 377 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।

निचली अदालत ने क्यों किया था बरी

सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। इसलिए आरोपी को बरी कर दिया गया। इसी फैसले के खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट ने किन तथ्यों पर भरोसा किया?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि जिरह के दौरान महिला ने स्वीकार किया था कि उसने महिला आयोग के समक्ष 30 लाख रुपये में समझौते की इच्छा जताई थी। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि आरोपी ने 15 लाख रुपये का चेक दिया था, लेकिन समझौता नहीं होने के कारण भुगतान रोक दिया गया।

अदालत ने महिला के उस बयान पर भी ध्यान दिया जिसमें उसने कहा था कि वह दोनों परिवारों की सहमति मिलने पर ही विवाह करना चाहती थी। महिला के भाई ने भी गवाही में स्वीकार किया कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और उसी के चलते शारीरिक संबंध बने।

मेडिकल परीक्षण करने वाले डॉक्टर की गवाही में भी जबरन या अप्राकृतिक यौन संबंध की कोई शिकायत दर्ज नहीं थी। जांच में ऐसे किसी प्रकार की चोट भी नहीं मिली, जिससे बलपूर्वक अप्राकृतिक संबंध की पुष्टि हो सके।

सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत का हवाला

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष सही था। अदालत ने कहा कि दोनों लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे थे और उनके बीच शारीरिक संबंध सहमति से बने थे। ऐसे में केवल विवाह न होने के आधार पर आरोपी को दुष्कर्म का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप हाईकोर्ट ने आरोपी की बरी होने की व्यवस्था को बरकरार रखते हुए महिला की अपील खारिज कर दी।

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