कांग्रेस ने सरकार से मांगा जवाब-जब जमीन, भवन और मशीनें सब सरकारी हैं तो निजी भागीदारी क्यों? मरीजों के अधिकार, डॉक्टरों की कमी और पारदर्शिता गायब 

बिलासपुरबिलासपुर के कोनी स्थित 240 बिस्तरीय स्वर्गीय कुमार दिलीप सिंह जूदेव शासकीय सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और 100 बिस्तरीय कैंसर केयर अस्पताल एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। इस बार वजह अस्पताल की इमारत या आधुनिक मशीनें नहीं, बल्कि उसका संचालन है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि लगभग ₹200 करोड़ की लागत से पूरी तरह सरकारी संसाधनों से तैयार किए गए अस्पताल को पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल पर सौंपने की तैयारी की जा रही है।

पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष एवं बेलतरा विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी विजय केशरवानी ने गुरुवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि बिलासपुर संभाग के लाखों लोगों के स्वास्थ्य अधिकार का प्रश्न है। उन्होंने सरकार से पूछा कि यदि अस्पताल के निर्माण के लिए जमीन सरकार ने दी, पैसा जनता के करों से आया और करोड़ों रुपये की मशीनें भी सरकार ने खरीदीं, तो अब इसके संचालन के लिए निजी भागीदारी की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?

उन्होंने कहा कि जनता को केवल उद्घाटन नहीं, बल्कि इलाज चाहिए। अस्पताल पूरी क्षमता से कब चलेगा और गरीब मरीजों को क्या सुविधाएं मिलेंगी, इसका जवाब सरकार को देना चाहिए।

PM ने किया था उद्घाटन, लेकिन अधूरी सुविधाएं

कोनी स्थित इस सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल का उद्घाटन 29 अक्टूबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअल माध्यम से किया था। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। उस समय दावा किया गया था कि यह अस्पताल बिलासपुर सहित पूरे उत्तर छत्तीसगढ़ के मरीजों के लिए आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का नया केंद्र बनेगा।

करीब ₹200 करोड़ की लागत से तैयार इस अस्पताल में 240 बिस्तर, जिनमें लगभग 70 आईसीयू एवं आईसीसीयू बेड, 8 मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर, सीटी स्कैन, एमआरआई, अत्याधुनिक लैब, आधुनिक ऑपरेशन सुविधाएं और अन्य हाई-एंड मेडिकल उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं। इसके साथ ही परिसर में 100 बिस्तरीय कैंसर केयर अस्पताल भी विकसित किया गया है।

लेकिन उद्घाटन के कई महीने बाद भी अस्पताल अपनी पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पाया है। वर्तमान में ओपीडी सेवाएं संचालित हो रही हैं, लेकिन कई विशेषज्ञ विभाग, आईपीडी सेवाएं, आईसीयू और अन्य सुविधाएं सीमित स्तर पर उपलब्ध हैं। गंभीर मरीजों को अब भी रायपुर अथवा निजी अस्पतालों के लिए रेफर किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

डॉक्टरों और स्टाफ की भारी कमी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की पहचान केवल उसकी इमारत या मशीनों से नहीं होती। उसकी वास्तविक क्षमता वहां उपलब्ध विशेषज्ञ डॉक्टरों, प्रशिक्षित नर्सों, तकनीकी कर्मचारियों और पैरामेडिकल स्टाफ पर निर्भर करती है।

बिलासपुर का यह अस्पताल भी इसी समस्या से जूझ रहा है। विभिन्न अवसरों पर अस्पताल के लिए संविदा भर्ती, वॉक-इन इंटरव्यू और विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति के विज्ञापन जारी किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि मानव संसाधन की कमी अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

कांग्रेस का कहना है कि यदि पर्याप्त डॉक्टर और कर्मचारी पहले ही नियुक्त कर दिए जाते, तो अस्पताल को निजी भागीदारी की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

PPP मॉडल आखिर है क्या?

PPP यानी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप ऐसा मॉडल है जिसमें सरकारी संपत्ति का संचालन निजी संस्था की भागीदारी से किया जाता है। सरकार आमतौर पर भवन, भूमि या आधारभूत संरचना उपलब्ध कराती है, जबकि निजी संस्था संचालन, मानव संसाधन, प्रबंधन और कई मामलों में चिकित्सा सेवाओं का दायित्व संभालती है।

सरकार का तर्क सामान्यतः यह होता है कि निजी प्रबंधन से सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बेहतर हो सकती है।

लेकिन दूसरी ओर यह आशंका भी रहती है कि निजी भागीदारी बढ़ने से इलाज महंगा हो सकता है और गरीब मरीजों की पहुंच प्रभावित हो सकती है।

छत्तीसगढ़ में पहले भी अपनाया गया है PPP मॉडल

स्वास्थ्य क्षेत्र में पीपीपी मॉडल कोई नई व्यवस्था नहीं है। छत्तीसगढ़ सरकार पहले भी कई स्वास्थ्य परियोजनाओं में इस मॉडल पर काम कर चुकी है।

बस्तर संभाग में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के संचालन के लिए कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल्स (तेलंगाना) के साथ समझौते की प्रक्रिया सार्वजनिक हो चुकी है।

इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस ने आशंका जताई है कि बिलासपुर अस्पताल के संचालन की दिशा भी उसी मॉडल की ओर बढ़ रही है।

PPP प्रक्रिया को लेकर क्या हैं दावे?

प्रेस कॉन्फ्रेंस में विजय केशरवानी ने दावा किया कि चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा जून 2026 में जारी पत्रों में पीपीपी मॉडल की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है।

उनके अनुसार इन दस्तावेजों में-

  • संशोधित आरएफपी (Request for Proposal)
  • लाइसेंस एग्रीमेंट
  • फाइनेंशियल मॉडलिंग
  • टेंडर प्रोसेसिंग कमेटी (TPC)
  • तथा KPMG जैसी कंसल्टेंसी एजेंसी की भूमिका का उल्लेख है।

कांग्रेस ने सरकार से पूछे ये सीधे सवाल

प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस नेता केशरवानी ने सरकार के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न रखे-

  • जब अस्पताल पूरी तरह सरकारी संसाधनों से बना है तो निजी भागीदारी क्यों आवश्यक हुई?
  • पीपीपी मॉडल से आम मरीज को ऐसा कौन-सा लाभ मिलेगा जो सरकारी व्यवस्था में संभव नहीं था?
  • गरीब, किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए मुफ्त या रियायती इलाज की क्या लिखित गारंटी होगी?
  • आयुष्मान भारत योजना से बाहर के सामान्य मरीजों का क्या होगा?
  • अस्पताल में डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी कर्मचारियों के कितने पद स्वीकृत हैं और कितने अभी खाली हैं?
  • इलाज की दरें कौन तय करेगा?
  • अस्पताल का वास्तविक नियंत्रण किसके पास रहेगा?
  • मरीजों की शिकायतों के लिए जवाबदेह कौन होगा?

सबसे बड़ी चिंता, क्या इलाज महंगा हो जाएगा?

पीपीपी मॉडल के विरोध का सबसे बड़ा आधार यही है कि सरकारी अस्पतालों का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं बल्कि जनसेवा होता है।

यदि निजी संस्था संचालन संभालती है तो यह आशंका बनी रहती है कि

  • इलाज की फीस बढ़ सकती है।
  • महंगी जांचों की संख्या बढ़ सकती है।
  • गरीब मरीजों के लिए सेवाएं सीमित हो सकती हैं।
  • निजी और सामान्य मरीजों के बीच सुविधाओं का अंतर पैदा हो सकता है।

हालांकि यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और निजी संस्था के बीच होने वाले समझौते की शर्तें क्या होंगी।

क्या आयुष्मान भारत पर्याप्त सुरक्षा देगा?

कांग्रेस का कहना है कि केवल आयुष्मान भारत योजना का उल्लेख पर्याप्त नहीं है।

कई मरीज ऐसे होते हैं जो योजना के पात्र नहीं होते या उनकी बीमारी योजना के दायरे से बाहर होती है।

ऐसे में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि

  • गरीबों के लिए कितने बेड आरक्षित होंगे?
  • सामान्य मरीजों की अधिकतम फीस क्या होगी?
  • यदि निजी संस्था नियमों का पालन नहीं करती तो उस पर क्या कार्रवाई होगी?

सरकारी नियंत्रण कितना रहेगा?

पीपीपी मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नियंत्रण और जवाबदेही है।

कांग्रेस का कहना है कि सरकार को पहले से स्पष्ट करना चाहिए कि-

  • अस्पताल का प्रशासनिक नियंत्रण किसके पास रहेगा?
  • डॉक्टरों की नियुक्ति कौन करेगा?
  • चिकित्सा शुल्क कौन तय करेगा?
  • शिकायतों का निवारण कौन करेगा?
  • गुणवत्ता की निगरानी कौन करेगा?

यदि ये सभी बातें सार्वजनिक नहीं होतीं तो भविष्य में विवाद की स्थिति बन सकती है।

करोड़ों की मशीनें बेकार न चली जाएं

सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में करोड़ों रुपये की अत्याधुनिक मशीनें स्थापित की गई हैं।

यदि पर्याप्त डॉक्टर और तकनीकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं होंगे तो इन मशीनों का पूरा उपयोग नहीं हो पाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति सार्वजनिक धन की बर्बादी मानी जाएगी।

इसी कारण कांग्रेस ने पहले सरकारी भर्ती प्रक्रिया पूरी करने और उसके बाद ही किसी वैकल्पिक मॉडल पर विचार करने की मांग की है।

दिलीप सिंह जूदेव के नाम से जुड़ी जनभावना

अस्पताल का नाम स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव के नाम पर रखा गया है, जिनकी पहचान जनसेवा से जुड़ी रही है।

कांग्रेस ने कहा कि यदि उनके नाम पर बने अस्पताल में गरीब मरीजों को ही बेहतर इलाज न मिल सके तो यह जनभावनाओं के अनुरूप नहीं होगा।

कांग्रेस की पांच प्रमुख मांगें

प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस ने सरकार के सामने पांच प्रमुख मांगें रखीं-

  1. अस्पताल को तत्काल पूर्ण क्षमता से शुरू किया जाए।
  2. डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल और तकनीकी कर्मचारियों के सभी पद तत्काल भरें जाएं।
  3. आईसीयू, कैथ लैब, ऑक्सीजन प्लांट, इमरजेंसी सेवाएं और एम्बुलेंस पूरी तरह संचालित की जाएं।
  4. पीपीपी मॉडल लागू करने से पहले गरीब मरीजों के अधिकारों और मुफ्त इलाज की लिखित गारंटी दी जाए।
  5. पीपीपी से जुड़े सभी दस्तावेज, समझौते और शर्तें सार्वजनिक की जाएं।

स्वास्थ्य का सवाल, राजनीति से बड़ा

कोनी का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल केवल एक इमारत नहीं है। यह उत्तर छत्तीसगढ़ के लाखों लोगों की स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ा संस्थान है। इस अस्पताल के निर्माण में जनता का पैसा लगा है और लोगों की अपेक्षा भी इसी से जुड़ी है कि यहां आधुनिक और सुलभ इलाज मिले।

यदि सरकार पीपीपी मॉडल अपनाती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह जनता का विश्वास बनाए रखे। इसके लिए पारदर्शी समझौता, सरकारी नियंत्रण, गरीब मरीजों के अधिकारों की स्पष्ट गारंटी और इलाज की सुलभ व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।

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