ट्रायल कोर्ट ने 11 साल पहले सुनाई थी उम्र कैद की सजा 

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 2013 में अंबिकापुर स्थित श्रीराम फाइनेंस कंपनी कार्यालय में महिला की हत्या के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उम्रकैद की सजा काट रहे आरोपी को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन अभियोजन पक्ष ऐसी साक्ष्यों की पूर्ण और अटूट श्रृंखला स्थापित करने में असफल रहा, जो आरोपी को संदेह से परे अपराधी साबित कर सके।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने मनोज शर्मा की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत का दोषसिद्धि और सजा का आदेश निरस्त कर दिया।

2015 में सुनाई गई थी उम्रकैद

मनोज शर्मा ने 18 दिसंबर 2015 को ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। निचली अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या), 450 (घर में अनाधिकृत प्रवेश) और 427 (संपत्ति को नुकसान पहुंचाना) के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास सहित अन्य सजाएं सुनाई थीं।

क्या था मामला

अभियोजन के अनुसार, 5 सितंबर 2013 की रात आरोपी ने अंबिकापुर स्थित श्रीराम फाइनेंस कंपनी के कार्यालय में घुसकर उर्मिला उर्फ गुड्डी की हथौड़े से हत्या कर दी थी। आरोप था कि घटना के बाद कार्यालय में रखी तिजोरी तोड़ने का प्रयास भी किया गया, जिससे कार्यालय की संपत्ति को काफी नुकसान पहुंचा।

हत्या होना साबित, लेकिन आरोपी का अपराध नहीं

हाईकोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चिकित्सक की गवाही के आधार पर यह माना कि उर्मिला की मौत हत्या के कारण हुई थी। हालांकि अदालत ने कहा कि केवल यह साबित हो जाना कि मौत हत्या थी, किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है।

अदालत ने कहा कि अभियोजन को यह भी संदेह से परे साबित करना आवश्यक था कि हत्या आरोपी ने ही की है।

कार्यालय की जानकारी होना पर्याप्त नहीं

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि मनोज शर्मा पहले श्रीराम फाइनेंस कार्यालय में इंटीरियर डेकोरेटर के रूप में काम कर चुके थे और उन्हें कार्यालय की बनावट की जानकारी थी।

हाईकोर्ट ने माना कि यह तथ्य सही हो सकता है, लेकिन केवल परिसर की जानकारी होने से किसी व्यक्ति की अपराध में संलिप्तता सिद्ध नहीं हो जाती।

स्वीकारोक्ति को भरोसेमंद नहीं पाया गया 

अभियोजन ने आरोपी द्वारा सहकर्मी के सामने किए गए कथित अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति (एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन) का भी हवाला दिया था।

हाईकोर्ट ने इसे अविश्वसनीय माना। अदालत ने कहा कि कथित स्वीकारोक्ति घटना के 12 दिन बाद बताई गई और उसके समर्थन में कोई स्वतंत्र एवं ठोस साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया।

हथौड़ा और कटर की बरामदगी भी हुई थी

अदालत ने आरोपी की निशानदेही पर हथौड़ा और कटर बरामद किए जाने के दावे की भी समीक्षा की। हाईकोर्ट ने पाया कि इन वस्तुओं की फॉरेंसिक जांच ही नहीं कराई गई थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी वस्तु की बरामदगी, बिना वैज्ञानिक और अन्य पुष्टिकारक साक्ष्यों के, दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती।

खंडपीठ ने यह भी उल्लेख किया कि फिंगरप्रिंट और फुटप्रिंट से जुड़े साक्ष्य भी निचली अदालत में विधिवत सिद्ध नहीं किए गए थे।

‘पांच स्वर्णिम सिद्धांत’ पूरे नहीं कर सका अभियोजन

सभी साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा शरद बिर्धीचंद सरडा बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में निर्धारित ‘पांच स्वर्णिम सिद्धांतों’ का पालन इस मामले में नहीं हुआ।

अदालत ने कहा कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ ऐसी साक्ष्य श्रृंखला प्रस्तुत करने में विफल रहा, जिससे किसी अन्य संभावना की गुंजाइश न बचती।

संदेह का लाभ देकर किया बरी

इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने मनोज शर्मा को भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 450 और 427 के सभी आरोपों से संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला और सजा दोनों निरस्त कर दिए।

चूंकि अपील के दौरान आरोपी पहले से जमानत पर था, इसलिए हाईकोर्ट ने उसे आत्मसमर्पण करने से छूट देते हुए निर्देश दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437-ए के तहत उसका जमानत बंधपत्र अगले छह माह तक प्रभावी रहेगा।

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