जांजगीर-चांपा। जांजगीर-चांपा जिले के बलौदा विकासखंड स्थित शासकीय प्राथमिक शाला कथापाली में पदस्थ सहायक शिक्षिका (एलबी) गीता कुम्भकार को अंधविश्वास को बढ़ावा देने के आरोप में तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने जांच रिपोर्ट के आधार पर यह कार्रवाई करते हुए कहा कि सरकारी विद्यालय में इस तरह की गतिविधियां वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत हैं तथा विभाग की छवि को धूमिल करती हैं।
सोने की बाली खोने के बाद कराया टोटका
जानकारी के अनुसार 31 जुलाई को शिक्षिका गीता कुम्भकार की सोने की एक बाली स्कूल परिसर में कहीं खो गई थी। बाली तलाशने के बजाय उन्होंने प्राथमिक कक्षा के बच्चों को एकत्र कर लाल कपड़ा, पीला धागा, नारियल और चावल जैसी सामग्री के साथ कथित टोटका कराया।
बच्चों को दी बीमारी और अनहोनी की धमकी
आरोप है कि शिक्षिका ने बच्चों से कहा कि यदि किसी ने बाली के बारे में सही जानकारी नहीं दी तो उसे पेट दर्द, तेज बुखार या कोई बड़ी अनहोनी का सामना करना पड़ेगा। इस चेतावनी से छोटे बच्चे भयभीत हो गए।
स्कूल से घर लौटने पर बच्चों ने पूरी घटना अपने परिजनों को बताई, जिसके बाद गांव और विद्यालय में नाराजगी फैल गई। मामले की शिकायत होने पर शिक्षा विभाग ने जांच शुरू कराई।
जांच में आरोप सही पाए गए
बलौदा के विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) की जांच में सामने आया कि शिक्षिका ने वास्तव में अंधविश्वास से जुड़ी सामग्री का उपयोग कर बच्चों के बीच भय का माहौल बनाया। रिपोर्ट में इसे सरकारी विद्यालयों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत माना गया।
नोटिस का जवाब नहीं देने पर निलंबन
जांच के बाद शिक्षिका को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, लेकिन निर्धारित अवधि में उनका जवाब प्राप्त नहीं हुआ। इसे छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के प्रावधानों का उल्लंघन मानते हुए जिला शिक्षा अधिकारी ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के नियम-9 के तहत उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।
निलंबन अवधि के दौरान गीता कुम्भकार का मुख्यालय विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय, बलौदा निर्धारित किया गया है।
वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना शिक्षकों की जिम्मेदारी
आदेश में जिला शिक्षा अधिकारी ने कहा कि सरकारी स्कूलों में बच्चों के बीच वैज्ञानिक सोच, तर्कशीलता और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देना शिक्षकों की जिम्मेदारी है। अंधविश्वास फैलाने वाली गतिविधियां न केवल अनुशासनहीनता हैं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की मूल भावना के भी विरुद्ध हैं।














