छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा- लंबे समय तक रहने या मकान बनाने से नहीं मिलता मालिकाना हक, कानूनी अधिकार साबित करना जरूरी
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी विदेशी नागरिक का सरकारी भूमि पर कोई वैध अधिकार नहीं है, तो वह वहां बने रहने के लिए न्यायालय से संरक्षण की मांग नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल वर्षों तक सरकारी जमीन पर रहने या मकान बनाकर कब्जा करने से किसी को उस भूमि पर स्वामित्व अथवा कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने 22 जुलाई को पारित आदेश में सूरजपुर जिले के ग्राम मदनपुर में रह रहे बांग्लादेशी शरणार्थियों की ओर से दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।
हटाने की कार्रवाई रोकने की लगाई थी गुहार
याचिकाकर्ताओं ने प्रशासन द्वारा जारी नोटिसों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट से मांग की थी कि उनके मकानों और दुकानों को न तोड़ा जाए और उन्हें सरकारी भूमि से बेदखल करने की कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।
याचिका में दावा किया गया था कि वे और उनके परिवार वर्ष 1964 में पुनर्वास योजना के तहत बांग्लादेश से भारत आए थे और तब से उसी भूमि पर रह रहे हैं। उनका कहना था कि पिछले 60 वर्षों में उन्होंने मकान बनाए, खेती की, ट्यूबवेल लगाए और उनकी आजीविका इसी भूमि पर निर्भर है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिस भूमि पर वे रह रहे हैं, उसे उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय को हॉर्टिकल्चर कॉलेज स्थापित करने के लिए आवंटित कर दिया गया, जबकि परियोजना के लिए अन्य सरकारी भूमि उपलब्ध थी।
राज्य सरकार ने बताया सरकारी भूमि
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित भूमि सरकारी है और उसे जनहित की परियोजना के लिए विधिवत आवंटित किया गया है। याचिकाकर्ता अपने पक्ष में ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके, जिससे यह साबित हो कि उन्हें इस भूमि पर स्वामित्व या वैध कब्जे का अधिकार प्राप्त है।
सरकार ने यह भी कहा कि लंबे समय तक सरकारी भूमि पर रहने मात्र से किसी को उस पर कब्जा बनाए रखने का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।
विवादित तथ्यों पर रिट याचिका में फैसला संभव नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में कई तथ्य विवादित हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या याचिकाकर्ताओं का भूमि पर कोई वैध अधिकार है। ऐसे विवादों का निपटारा रिट याचिका के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता सरकारी भूमि पर अपने अधिकार का कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके।
विदेशियों के अधिकारों पर भी अदालत की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि विदेशी नागरिकों के मौलिक अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 तक सीमित हैं। यदि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है और सरकारी भूमि पर अपने वैध अधिकार को सिद्ध नहीं कर पाता, तो वह अनधिकृत कब्जे को बनाए रखने के लिए हाईकोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र का लाभ नहीं ले सकता।
इस संबंध में अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के सरबानंद सोनोवाल बनाम भारत संघ तथा जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य के फैसलों का भी उल्लेख किया। इन निर्णयों में स्पष्ट किया गया है कि सरकारी भूमि पर लंबे समय तक कब्जा या निर्माण कर लेने से किसी प्रकार का कानूनी, न्यायसंगत या स्थायी अधिकार उत्पन्न नहीं होता।
जनहित के लिए सुरक्षित है सरकारी भूमि
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी भूमि का उपयोग सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इसलिए केवल लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने के आधार पर उस पर अधिकार का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। चूंकि याचिकाकर्ता अपने अधिकार का कोई वैधानिक आधार प्रस्तुत नहीं कर सके, इसलिए सभी याचिकाएं खारिज कर दी गईं।













