जशपुर के 50-बेड अस्पताल के टेंडर का मामला; हाई कोर्ट ने ठेकेदार को ₹1 लाख देने का दिया था आदेश
बिलासपुर। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन लिमिटेड (CGMSC) को बड़ी राहत देते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें निगम पर ₹1 लाख की लागत लगाई गई थी। शीर्ष अदालत ने पाया कि टेंडर प्रक्रिया के तहत ठेकेदार द्वारा बताए गए ई-मेल पते पर ही आवश्यक सूचना भेजी गई थी। इसलिए निगम की ओर से प्रक्रिया में कोई ऐसी गलती नहीं हुई, जिसके आधार पर उस पर जुर्माना लगाया जाए।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 10 अगस्त को CCGMSC की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
9.9 फीसदी कम बोली के बावजूद वित्तीय बोली नहीं खुली
मामला जशपुर जिले में 50 बिस्तरों वाले अस्पताल के निर्माण से जुड़े टेंडर का है। 23 सितंबर 2025 को जारी निविदा में पत्थलगांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 50-बेड अस्पताल में विकसित करने का काम शामिल था। इसमें पानी की आपूर्ति, सैनिटरी और विद्युतीकरण कार्य भी शामिल थे। परियोजना की अनुमानित लागत ₹400.98 लाख थी।
याचिकाकर्ता ठेकेदार ने अनुमानित लागत से 9.9 फीसदी कम दर पर बोली लगाई थी, जबकि सफल बोलीदाता ने 9.22 फीसदी कम दर प्रस्तुत की। इसके बावजूद ठेकेदार की तकनीकी बोली खारिज कर दी गई और उसकी वित्तीय बोली खोली ही नहीं गई।
ठेकेदार ने आरोप लगाया कि उसकी बोली को गलत तरीके से बाहर किया गया, जिससे न केवल उसे नुकसान हुआ बल्कि सरकारी धन पर भी अतिरिक्त भार पड़ा और सफल बोलीदाता को अनुचित लाभ मिला।
हाई कोर्ट ने ई-मेल को माना था गंभीर चूक
ठेकेदार ने हाई कोर्ट में दलील दी थी कि CCGMSC ने Annexure-A/2 के संबंध में स्पष्टीकरण एक ऐसे ई-मेल पते पर भेजा था, जिसे उसने न तो इस टेंडर में दिया था और न ही पहले किसी पत्राचार में इस्तेमाल किया था। निगम का कहना था कि ठेकेदार से स्पष्टीकरण मांगा गया था, लेकिन उसने निर्धारित समय में जवाब नहीं दिया।
5 फरवरी 2026 को चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने माना था कि महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण मांगने वाला ई-मेल गलत पते पर भेजा गया। कोर्ट ने इसे महज तकनीकी या प्रक्रियागत गलती मानने से इनकार करते हुए कहा था कि सार्वजनिक प्राधिकरण से निष्पक्षता और पारदर्शिता के बुनियादी मानकों का पालन अपेक्षित है।
हाई कोर्ट ने यह भी पाया था कि ठेकेदार ने जिन दस्तावेजों और पात्रता संबंधी प्रमाणों को प्रस्तुत किया था, उन्हें CGMSC की एक अन्य निविदा में स्वीकार किया गया था। वहीं, इस टेंडर में उन्हें ठोस कारण बताए बिना अस्वीकार कर दिया गया। अदालत ने इसे मनमाना व्यवहार मानते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत माना था।
काम शुरू हो चुका था, इसलिए टेंडर रद्द नहीं किया
हाई कोर्ट ने हालांकि ठेका रद्द करने से इनकार कर दिया था। अदालत ने माना था कि काम पहले ही दूसरी कंपनी को दिया जा चुका है और निर्माण कार्य चल रहा है। ऐसे में ठेका रद्द करने से सार्वजनिक परियोजना में देरी हो सकती थी।
इसी आधार पर कोर्ट ने राहत का स्वरूप बदलते हुए CCGMSC को ठेकेदार को ₹1 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया था। चार सप्ताह में भुगतान नहीं होने पर 6 फीसदी सालाना ब्याज का प्रावधान भी किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- निगम ने टेंडर नियमों का पालन किया
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि निगम ने ठेकेदार को नोटिस उसी ई-मेल पते पर भेजे थे, जिसे स्वयं ठेकेदार ने टेंडर दस्तावेजों में निर्धारित किया था। ऐसे में निगम की ओर से प्रक्रिया संबंधी कोई त्रुटि नहीं पाई गई।
शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट द्वारा CGMSC पर लगाई गई ₹1 लाख की लागत को हटा दिया और विशेष अनुमति याचिका का निपटारा कर दिया। इस फैसले से निगम को राहत मिली है, जबकि जशपुर के अस्पताल निर्माण से जुड़े टेंडर विवाद में हाई कोर्ट के आदेश का वह हिस्सा प्रभावी नहीं रहेगा, जिसमें CCGMSC को ठेकेदार को ₹1 लाख देने का निर्देश दिया गया था।














