छह साल से अधूरा है देहारगुड़ा-खंभाठा पुल, बारिश में लोहे की सीढ़ी और सरियों के बीच से स्कूल पहुंच रहे बच्चे; ग्रामीणों ने दी हाईवे जाम की चेतावनी

गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर इलाके में बारिश के दिनों में स्कूल जाना बच्चों के लिए पढ़ाई तक पहुंचने का रास्ता नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच संतुलन साधने जैसा बन गया है। खंभाठा और आसपास की बस्तियों के बच्चे उफनती पैरी नदी के ऊपर बने अधूरे पुल के हिस्से से होकर स्कूल जाने को मजबूर हैं। करीब 20 फीट नीचे तेज बहाव और ऊपर फिसलन भरी लोहे की सीढ़ी- जरा सी चूक और बड़ा हादसा हो सकता है।

करीब छह साल से अधूरा पड़ा लगभग 300 मीटर लंबा देहारगुड़ा-खंभाठा पुल अब सरकारी सुस्ती की ऐसी तस्वीर बन गया है, जिसकी कीमत ग्रामीण और स्कूली बच्चे रोज अपनी जान जोखिम में डालकर चुका रहे हैं।

बारिश में नदी बन जाती है खतरे का रास्ता

पैरी नदी गर्मी और सर्दी के मौसम में अपेक्षाकृत शांत रहती है। गर्मियों में कई हिस्सों में नदी का तल सूख जाता है और लोग पैदल, साइकिल या बाइक से इसे पार कर लेते हैं। लेकिन मानसून आते ही तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।

जून के मध्य से सितंबर तक बारिश के दौरान पैरी नदी में पानी तेजी से बढ़ता है। सामान्य दिनों में आसानी से पार होने वाली नदी देखते ही देखते तेज धार में बदल जाती है। ऐसे में बच्चों के सामने स्कूल जाने के लिए अधूरे पुल के खंभे से लगी संकरी लोहे की सीढ़ी और पुल का निर्माणाधीन हिस्सा ही रास्ता बचता है।

कंधे पर स्कूल बैग और नीचे उफनता पानी- इन बच्चों की रोज की मजबूरी किसी भी संवेदनशील व्यवस्था को झकझोरने के लिए काफी है।

अधूरा पुल बना बच्चों की मजबूरी

मैनपुर तहसील मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर दूर देहारगुड़ा और खंभाठा के बीच इस पुल का निर्माण करीब छह साल पहले शुरू हुआ था। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से निर्माण कार्य बेहद धीमी गति से चल रहा है।

पुल के निर्माण के दौरान जगह-जगह निकली लोहे की सरियां भी खतरा बनी हुई हैं। ग्रामीणों के मुताबिक इन सरियों से लोगों को चोट लग चुकी है। बारिश में लोहे की सीढ़ियां और निर्माणाधीन हिस्सा फिसलन भरा हो जाता है, जिससे बच्चों का जोखिम और बढ़ जाता है।

प्राथमिक, मिडिल और हाईस्कूल में पढ़ने वाले दर्जनों बच्चे इसी रास्ते से आवागमन करते हैं।

वीडियो वायरल हुआ तो सामने आया खतरनाक सच

बच्चों के इस जोखिम भरे सफर के वीडियो ग्रामीणों ने बनाकर सोशल मीडिया पर साझा किए। वीडियो सामने आने के बाद अधूरे पुल और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर सवाल उठने लगे।

यह समस्या आज की नहीं है। करीब एक साल पहले निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और तत्कालीन कलेक्टर ने भी मौके का निरीक्षण किया था। अधिकारियों और ठेकेदार को निर्माण कार्य तेज करने के निर्देश दिए गए थे।

ग्रामीणों के अनुसार उस समय उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि पुल करीब छह महीने में पूरा कर दिया जाएगा। लेकिन वह समय-सीमा कब की बीत चुकी है और पुल अब भी अधूरा है।

अब ग्रामीणों का सब्र जवाब देने लगा

लगातार आश्वासन और इंतजार के बाद ग्रामीणों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। उनका कहना है कि यदि प्रशासन ने जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो वे राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्काजाम करने के लिए मजबूर होंगे।

ग्रामीणों की मांग सिर्फ पुल को जल्द पूरा करने की नहीं है। तत्काल जरूरत इस बात की है कि जब तक पुल तैयार नहीं होता, तब तक बच्चों और आम लोगों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक रास्ता बनाया जाए।

कलेक्टर ने दिया तत्काल समाधान का भरोसा

मामला सामने आने के बाद गरियाबंद कलेक्टर रणबीर शर्मा ने मौके का निरीक्षण करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों और ग्रामीणों से चर्चा कर तत्काल समाधान की संभावनाएं समझी जा रही हैं।

कलेक्टर के मुताबिक परियोजना की स्थिति की समीक्षा की जाएगी और यदि देरी के लिए कोई जिम्मेदार है तो उसकी जवाबदेही तय की जाएगी। साथ ही बच्चों और ग्रामीणों के लिए अस्थायी सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराने तथा पुल निर्माण को समयबद्ध तरीके से पूरा करने की योजना बनाने की बात कही गई है।

माओवादी प्रभावित इलाके में विकास की असली परीक्षा

मैनपुर क्षेत्र लंबे समय तक माओवादी गतिविधियों से प्रभावित रहा है। ओडिशा सीमा से लगे इस इलाके के घने जंगल कभी माओवादी प्रभाव का गढ़ माने जाते थे। पिछले साल तक चले सुरक्षा अभियानों के बाद क्षेत्र में माओवादी प्रभाव काफी कमजोर हुआ और सामान्य जनजीवन लौटने की उम्मीद मजबूत हुई।

ऐसे क्षेत्र में सड़क, पुल और दूसरी बुनियादी सुविधाएं केवल विकास की योजनाएं नहीं, बल्कि लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने का माध्यम भी हैं। लेकिन छह साल से अधूरा पुल इस पूरी तस्वीर पर सवाल खड़ा करता है।

जिस पुल से ग्रामीणों को सुविधा मिलनी थी, वही आज बच्चों के लिए उफनती नदी के ऊपर जिंदगी का इम्तिहान बन गया है।

सवाल सिर्फ पुल पूरा होने का नहीं, अगली दुर्घटना से पहले जागने का है

बारिश हर साल आती है। पैरी नदी हर मानसून में उफनती है। बच्चे हर दिन स्कूल जाएंगे। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि किसी हादसे का इंतजार क्यों किया जाए?

क्या किसी बच्चे के नदी में गिरने के बाद पुल की फाइल आगे बढ़ेगी, या उससे पहले ही सुरक्षित रास्ता और अधूरे पुल का समाधान निकाल लिया जाएगा?

ग्रामीणों का गुस्सा और बच्चों की मजबूरी अब दोनों सामने हैं। गेंद प्रशासन के पाले में है।

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