भुवनेश्वर। ओडिशा के बालासोर जिले में 9 सितंबर 2026 की सुबह हुई एक अजीबोगरीब खोज ने न सिर्फ वन्यजीव संरक्षण की दुनिया को चौंका दिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी के एक बड़े नेटवर्क के खिलाफ बड़ी कार्रवाई का रास्ता भी खोल दिया।

भोगराई ब्लॉक के बिछित्रपुर-उदयपुर-तालसरी इलाके में कैजुरीना बागान में पांच छोटे ऑरंगुटान (तीन नर और दो मादा) मिले, जो भारत के किसी भी जंगल के मूल निवासी नहीं हैं। ये दुर्लभ प्रजाति सिर्फ दक्षिण-पूर्व एशिया के बोर्नियो और सुमात्रा द्वीपों में पाई जाती है और आईयूसीएन की सूची में क्रिटिकली एंडेंजर्ड (अत्यधिक संकटग्रस्त) श्रेणी में आती है।

रहस्यमय खोज और इंसानों से परिचय का सबूत

सुबह करीब 6:15 बजे वन सुरक्षा समिति (Van Suraksha Samiti) के सदस्यों ने इन जानवरों को देखा। पहले उन्होंने इन्हें बंदर समझा, लेकिन जल्दी ही साफ हो गया कि ये ऑरंगुटान हैं। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार ये छह से आठ महीने या एक साल से कम उम्र के थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि ये पूरी तरह स्वस्थ थे, किसी जंगली जानवर या कुत्ते-सियार से घायल नहीं हुए थे और इंसानों के पास बिल्कुल नहीं डरे। वे वन कर्मियों के व्यवहार पर आसानी से प्रतिक्रिया दे रहे थे।

बालासोर डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर प्रतीक प्रकाश इंदलकर और क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक प्रकाश चंद गोगिनेनी ने साफ कहा कि इनका व्यवहार बताता है कि ये कुछ समय तक इंसानों के साथ रह चुके हैं। जंगली ऑरंगुटान मादा आमतौर पर एक बार में एक ही बच्चा देती है। पांच बच्चे एक साथ मिलना और वे भी इतने स्वस्थ और दोस्ताना स्वभाव वाले, सीधे जंगल से आने की संभावना को लगभग खारिज कर देता है। अधिकारियों का अनुमान है कि इन्हें खोजे जाने से कुछ घंटे पहले ही, शायद रात में, छोड़ दिया गया था।

काली थार और सीसीटीवी का सुराग: तस्करी का पक्का संकेत

जांच में सबसे महत्वपूर्ण सुराग निकला एक काली थार एसयूवी। सोमवार रात करीब 11:25 बजे एक स्थानीय दुकान के सीसीटीवी में यह गाड़ी बादापाई गांव के पास वन क्षेत्र की ओर जाती और महज 15 मिनट में वापस लौटती दिखी। STF और वन विभाग 40 से अधिक सीसीटीवी फुटेज की जांच कर रहे हैं। ओडिशा पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने इस मामले को अपने हाथ में ले लिया है।

STF के इंस्पेक्टर जनरल हिमांशु लाल ने साफ कहा, “हम पूरे नेटवर्क को तोड़ देंगे। हम स्रोत, मंजिल और अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय तस्करी के सभी पहलुओं की जांच करेंगे। सख्त कार्रवाई होगी।” उन्होंने जोर दिया कि वैज्ञानिक और तकनीकी दोनों तरीकों से जांच की जा रही है।

समुद्री रास्ता, दीघा लिंक और करोड़ों का खेल

जांच अब पश्चिम बंगाल के दीघा तक पहुंच गई है। STF टीम ने दिघा के मरीन पुलिस स्टेशन की भी जांच की। आशंका है कि इन ऑरंगुटानों को समुद्री रास्ते से, ट्राउलर या जहाज के जरिए लाया गया हो। पूर्वी भारत का तटीय इलाका, खासकर ओडिशा-पश्चिम बंगाल सीमा, विदेशी जानवरों की तस्करी का ट्रांजिट रूट बन चुका है। एक बच्चे की कालाबाजारी कीमत 20-25 लाख रुपये बताई जा रही है। यानी पांच बच्चों की कुल कीमत एक करोड़ रुपये से ऊपर।

वन मंत्री गणेश राम सिंहखुंटिया ने अंतरराष्ट्रीय रैकेट की आशंका जताई है। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) भी मामले में जुड़ चुका है। कोलकाता और भोपाल यूनिट्स की टीमें सक्रिय हैं। भारतीय तटरक्षक बल से भी मदद मांगी गई है।

नंदनकानन में क्वारंटाइन और आगे की राह

इन पांचों को नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क भेज दिया गया है। वहां वे क्वारंटाइन में हैं। पशु चिकित्सक और वैज्ञानिक उनकी निगरानी कर रहे हैं। कुछ में कीड़े भी पाए गए हैं। डीएनए और ब्लड सैंपल लिए जा रहे हैं ताकि प्रजाति की सटीक पहचान हो सके। सेंट्रल जू अथॉरिटी से अनुमति मांगी गई है कि इन्हें स्थायी रूप से नंदनकानन में रखा जा सकता है या नहीं।

CITES (वन्य जीव और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर सम्मेलन) के तहत इन जानवरों को उनके मूल देश वापस भेजने की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है। लेकिन पहले यह साबित करना होगा कि ये जंगली थे या कैप्टिव ब्रीडिंग से आए।

आपराधिक पक्ष: संगठित गिरोह और पुरानी यादें

यह मामला सिर्फ पांच जानवरों का नहीं, बल्कि एक बड़े संगठित अपराध का संकेत है। विशेषज्ञों का कहना है कि अक्सर माताओं को मारकर बच्चों को चुराया जाता है या भयानक कैद की स्थिति में पाला जाता है। भारत में विदेशी जानवरों की निजी मांग—खासकर अमीर लोगों के फार्महाउस और निजी चिड़ियाघरों में—इस व्यापार को बढ़ावा दे रही है।

IFS अधिकारी पर्वीन कसवान जैसे विशेषज्ञों को यह घटना मणिपुर सीमा से होने वाली पुरानी तस्करी याद दिला रही है, जहां गिरोह ट्रेन और हवाई जहाज से जानवर ले जाते थे। ओडिशा का यह मामला पूर्वी भारत को विदेशी वन्यजीव तस्करी का बड़ा गलियारा साबित कर रहा है।

जांच अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन STF का संदेश साफ है—पूरा नेटवर्क उजागर होगा और तोड़ा जाएगा। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मामला दर्ज हो चुका है। अगर अंतरराष्ट्रीय कड़ी साबित हुई तो सजा और भी कठोर होगी।

यह घटना सिर्फ एक बचाव अभियान नहीं, बल्कि भारत में विदेशी जानवरों की कालाबाजारी के खतरे की चेतावनी है। पांच छोटे ऑरंगुटान अब सुरक्षित हैं, लेकिन उनके पीछे छिपा तस्करी का जाल अभी भी फैल रहा है। STF और WCCB की जांच से उम्मीद है कि इस जाल को हमेशा के लिए काट दिया जाएगा।

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