मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से एक साथ जुड़े जमीन के एक ही विवाद में धारा 17 CPC की व्याख्या
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जमीन विवाद में अदालत के क्षेत्राधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने कहा कि यदि एक ही संपत्ति विवाद से जुड़ी जमीन अलग-अलग अदालतों के क्षेत्राधिकार में स्थित है तो पूरा मुकदमा उस अदालत में चल सकता है, जिसके क्षेत्राधिकार में विवादित संपत्ति का कोई एक हिस्सा आता है।
कोर्ट ने जनकपुर सिविल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए शहडोल निवासी बृजेंद्रनाथ कुशवाहा समेत छह लोगों की याचिका खारिज कर दी।
तीन गांवों की जमीन को लेकर था विवाद
बीरेंद्र कुमार ने जनकपुर सिविल कोर्ट में अधिकारों की घोषणा, बंटवारे और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए सिविल मुकदमा दायर किया था। विवादित जमीन दारैन, खरिका टोला और घताई गांवों में स्थित है।
दारैन की जमीन मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में है, जबकि घताई और खरिका टोला की जमीन छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में आती है।
जनकपुर कोर्ट ने 10 अगस्त 2026 को मुकदमे को लेकर दायर आवेदन खारिज कर दिया था।
याचिकाकर्ताओं ने क्षेत्राधिकार पर उठाया सवाल
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि दारैन की जमीन उनकी स्व-अर्जित संपत्ति है और छत्तीसगढ़ की अदालत को उस जमीन से संबंधित विवाद सुनने का अधिकार नहीं है। उन्होंने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 16 के तहत आवेदन दिया था, जिसे जनकपुर कोर्ट ने खारिज कर दिया।
इसके बाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई।
धारा 17 के तहत अदालत में मुकदमा
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 17 के अनुसार, यदि एक ही विवाद से जुड़ी कई अचल संपत्तियां अलग-अलग अदालतों के क्षेत्राधिकार में स्थित हैं तो मुकदमा उस अदालत में दायर किया जा सकता है, जिसके क्षेत्राधिकार में उन संपत्तियों में से कोई एक स्थित हो।
कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के Shivnarayan v. Maniklal मामले में दिए गए सिद्धांत का भी उल्लेख किया।
चूंकि घताई और खरिका टोला की जमीन जनकपुर कोर्ट के क्षेत्राधिकार में आती है, इसलिए वहां पूरे विवाद की सुनवाई करना अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।














