जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचल बस्तर में सदियों पुरानी संस्कृति और अनोखी आस्था का महापर्व ‘विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा‘ अपनी भव्यता के साथ आगे बढ़ रहा है। इस ऐतिहासिक उत्सव की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक ‘जोगी बिठाई‘ की रस्म सिरहासार भवन में पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न कर ली गई है। इसके साथ ही अंचल की सुख-समृद्धि और निर्विघ्न पर्व आयोजन के लिए 9 दिवसीय अखंड साधना का शुभारंभ हो चुका है।
इस अनूठे और तकरीबन 600 साल पुराने उत्सव को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटकों और श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया है।
4 फीट गहरे कुंड में 9 दिनों का निर्जला व्रत
बस्तर दशहरे की इस अनोखी परंपरा के तहत इस वर्ष भी ग्राम बड़े आमाबाल के युवक दौलत कुमार नाग ‘जोगी’ के रूप में आसन पर बैठे हैं। वे सिरहासार भवन के भीतर तैयार किए गए लगभग 4 फीट गहरे गड्ढे (कुंड) में लगातार नौ दिनों तक पालथी मारकर कठिन तपस्या करेंगे। यह साधना पूरी तरह निराहार और निर्जला होती है, जिसमें जोगी बिना कुछ खाए-पीए चौबीसों घंटे एक ही स्थान पर अडिग रहकर देवी की आराधना करते हैं।
मावली मंदिर से सिरहासार भवन तक गूंजीं मंगल धुनें
जोगी बिठाई की इस पारंपरिक रस्म की शुरुआत स्थानीय मावली मंदिर में दीप प्रज्ज्वलन और पवित्र तलवार की विशेष पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके बाद मुंडाबाजा, मोहरी और पारंपरिक वाद्यों की मंगल ध्वनि के बीच जोगी पावन तलवार धारण कर सिरहासार भवन पहुंचे। राज परिवार के सदस्यों, पुजारियों और माझी-चालकियों की मौजूदगी में प्रार्थना करने के बाद जोगी ने विधि-विधान से भू-समाधि जैसा कठिन आसन ग्रहण किया।
काछन गादी रस्म से मिली महापर्व की अनुमति
इससे पूर्व, बस्तर दशहरा को विधिवत शुरू करने के लिए बेहद खास ‘काछन गादी’ की रस्म निभाई गई थी। परंपरा के अनुसार बेल के नुकीले कांटों से तैयार किए गए विशेष झूले पर पीहू नाम की एक नाबालिग कुंवारी कन्या को देवी स्वरूप में बिठाया गया। धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान कन्या के शरीर में स्वयं मां काछन देवी वास करती हैं। देवी रूपी बालिका से हरी झंडी (अनुमति) मिलने के बाद ही बस्तर राज परिवार और दशहरा समिति आगे के भव्य आयोजनों की शुरुआत करती है।
अब शुरू होगी विशाल चार पहियों वाले ‘फूल रथ’ की परिक्रमा
जोगी बिठाई की रस्म पूरी होते ही अब पर्व का मुख्य आकर्षण शुरू होने जा रहा है। बस्तर की दंतेश्वरी माई के छत्र को विराजमान कर चार चक्कों वाले विशाल पारंपरिक ‘फूल रथ’ की परिक्रमा जगदलपुर शहर में प्रतिदिन आयोजित की जाएगी। खास बात यह है कि देश के बाकी हिस्सों के विपरीत बस्तर दशहरे में भगवान राम की विजय या रावण दहन की कथा नहीं होती, बल्कि यह पूरी तरह से अधिष्ठात्री देवी मां दंतेश्वरी और स्थानीय जनजातीय रीति-रिवाजों को समर्पित है।













