बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के निलंबित भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी रतनलाल डांगी के खिलाफ जारी विभागीय जांच और अदालती प्रक्रिया में नए प्रशासनिक और कानूनी घटनाक्रम सामने आए हैं।

गृह विभाग के आदेश से पारुल माथुर की नियुक्ति

प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत पुलिस मुख्यालय (PHQ) द्वारा 17 सितंबर को राज्य के गृह विभाग को एक प्रस्ताव भेजा गया था। इसमें एडीजी दीपांशु काबरा को जांच अधिकारी तथा आईपीएस प्रशांत कुमार अग्रवाल को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी (Presenting Officer) बनाने का सुझाव दिया गया था।
इसके उपरांत गृह विभाग द्वारा 29 सितंबर को जारी अंतिम आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए दीपांशु काबरा को जांच अधिकारी बरकरार रखा गया, जबकि आईपीएस पारुल माथुर को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त किया गया। प्रस्तुतकर्ता अधिकारी के रूप में पारुल माथुर विभागीय जांच के समक्ष शासन एवं आरोपों से संबंधित दस्तावेज, साक्ष्य और पक्ष प्रस्तुत करेंगी।

मामले का विवरण एवं मुख्य आरोप

यह प्रकरण छत्तीसगढ़ पुलिस में कार्यरत एक सब-इंस्पेक्टर की पत्नी (जो योगा शिक्षक भी हैं) द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से संबंधित है। महिला ने अक्टूबर 2025 में पुलिस मुख्यालय में शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि योग कक्षाओं के दौरान पहचान होने के बाद वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी रतनलाल डांगी ने उनका लगभग सात वर्षों तक शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक उत्पीड़न किया। इन आरोपों और शुरुआती जांच के आधार पर राज्य शासन ने डांगी को मार्च 2026 में निलंबित कर दिया था। हालांकि, आरोपी अधिकारी रतनलाल डांगी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए महिला पर ब्लैकमेलिंग और धन वसूली के आरोप लगाए थे।

हाईकोर्ट में याचिका और पीएचक्यू-सरकार का कदम

प्रारंभिक जांच के लिए पुलिस विभाग द्वारा दो सदस्यीय समिति का गठन किया गया था, जिसमें आईपीएस डॉ. आनंद छाबड़ा और आईपीएस मिलना कुर्रे शामिल थे।
इस जांच प्रक्रिया से असंतुष्ट होकर पीड़िता ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में निम्नलिखित मुख्य बिंदु और मांगें उठाई गईं:
  • जांच अधिकारियों पर आपत्ति: पीड़िता ने तर्क दिया कि तत्कालीन जांच अधिकारियों में से एक अधिकारी आरोपी के समकक्ष रैंक के थे तथा दूसरी अधिकारी उनसे जूनियर थीं।
  • निष्पक्ष जांच की मांग: याचिकाकर्ता ने प्राथमिक जांच में अपना पक्ष ठीक से न सुने जाने का आरोप लगाते हुए किसी वरिष्ठ महिला अधिकारी या महिला आईएएस अधिकारी से जांच कराने की मांग की।
  • संपत्ति की जांच: याचिका में आरोपी अधिकारी की कथित चल-अचल संपत्तियों की जांच और दोष सिद्ध होने पर सेवा से बर्खास्तगी की गुहार लगाई गई।

सरकार एवं पीएचक्यू की प्रतिक्रिया

हाईकोर्ट द्वारा गृह सचिव से जवाब तलब किए जाने के बाद राज्य सरकार और पुलिस मुख्यालय ने अदालत को सूचित किया कि प्राथमिक जांच में आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए गए हैं। इसके साथ ही पुरानी जांच समिति के स्थान पर नए जांच अधिकारी (दीपांशु काबरा) और नए प्रस्तुतकर्ता अधिकारी (पारुल माथुर) की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया गया है।
वैसे प्रशासनिक विभागीय जांच में केवल प्रस्तुतकर्ता अधिकारी या जांच अधिकारी का नाम बदलना किसी भी पक्ष के लिए अंतिम निर्णय का सूचक नहीं है। प्रस्तुतकर्ता अधिकारी का कार्य केवल अभिलेख एवं साक्ष्य प्रस्तुत करना होता है। चूंकि मामला अब उच्च न्यायालय की निगरानी में है और विभागीय जांच प्रक्रियाधीन है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष साक्ष्यों के पूर्ण परीक्षण और अदालती फैसलों के आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

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