देशभर में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे सवालों और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कुरियन जोसेफ ने एक तीखा और साफ संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि संविधान की रक्षा के लिए सिर्फ चेतावनी देना काफी नहीं। अगर भौंकने से काम नहीं निकला, तो वॉचडॉग को काटना ही पड़ेगा।
वर्तमान हालात में दी गई चेतावनी
केरल हाईकोर्ट चैंबर कॉम्प्लेक्स में इंडियन एसोसिएशन ऑफ लॉयर्स, केरलम द्वारा आयोजित संवैधानिक सम्मेलन “भारत के चुनाव आयोग की आजादी: क्या समझौता किया गया?” में उद्घाटन भाषण देते हुए जस्टिस जोसेफ ने यह बात कही। यह कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ जब देशभर में चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को लेकर भारी विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। इस प्रक्रिया में लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की खबरों ने विपक्षी दलों, युवा संगठनों और आम नागरिकों में व्यापक नाराजगी पैदा की है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली, मुंबई समेत कई शहरों में प्रदर्शन हो रहे हैं।
इसी पृष्ठभूमि में जस्टिस जोसेफ का बयान और भी तीखा लगता है। उन्होंने कहा,
“भौंकने वाला कुत्ता शायद ही कभी काटता है। लेकिन यह भौंकने वाला कुत्ता — संरक्षक, वॉचडॉग या रखवाला- अगर भौंकने से मनचाहा नतीजा न मिले, तो काटने के लिए भी मजबूर हो जाता है।”
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर जोरदार टिप्पणी
जस्टिस जोसेफ ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक अदालतें, खासकर सुप्रीम कोर्ट, संविधान की संरक्षक और वॉचडॉग हैं। वॉचडॉग तब भौंकता है जब उसकी निगरानी वाली चीज खतरे में हो, ताकि मालिक यानी ‘हम भारत के लोग’ सतर्क हो जाएं। लेकिन आम आदमी की धारणा है कि ये उच्च संवैधानिक संस्थाएं न तो भौंकती हैं और न ही काटती हैं। नतीजा यह कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनी संस्थाओं की आजादी और अखंडता का सम्मान कम, उल्लंघन ज्यादा हो रहा है।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बुरी तरह डगमगा गई है। जब संसद और अदालतें अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम साबित होती हैं, तो डॉ. राम मनोहर लोहिया के शब्दों में सड़कें ही लोकतंत्र की रक्षा के लिए आगे आती हैं। नागरिकों का कर्तव्य है कि वे गलत होने पर जानकारी के साथ और शालीन तरीके से विरोध करें।
चुनाव आयोग की आजादी पर गंभीर सवाल
जस्टिस जोसेफ ने चुनाव आयोग को लेकर भी साफ बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि संस्था है। “सीईसी खुद कोई विशेष विशेषाधिकार नहीं रखता। यह संस्था है, व्यक्ति नहीं। दुर्भाग्य से, उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोग यह गलतफहमी पाल लेते हैं कि शक्ति व्यक्ति में केंद्रित है।”
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर उच्च पद पर बैठे व्यक्ति की अखंडता पर सवाल उठता है, तो संस्था की आजादी खत्म हो जाती है और यह लोकतंत्र के लिए मौत की घंटी है। उन्होंने संविधान में ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तों को स्पष्ट करने की मांग की, ताकि इसे संसद के कानूनों पर निर्भर न रहना पड़े।
वकीलों की चुप्पी सबसे खतरनाक
जस्टिस जोसेफ ने कानूनी बिरादरी को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा,
“कानून जानने वालों की चुप्पी, कानून तोड़ने वालों की हिंसा से ज्यादा हिंसा और समाज में समस्याएं पैदा करती है।”
उन्होंने चिंता जताई कि आज वकीलों का समुदाय बंटा नजर आता है। जब कोई कानून का जानकार संवैधानिक चिंता जताता है, तो लोग उसके तर्क पर नहीं, बल्कि उसके व्यक्तिगत बैकग्राउंड और पहचान पर हमला बोल देते हैं। संवैधानिक सिद्धांत इस बात पर निर्भर नहीं करते कि उन्हें कौन कह रहा है। जरूरत है कि संस्थाएं संवैधानिक रूप से निष्पक्ष रहें, न कि व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाएं।
लोकतंत्र की रक्षा का अंतिम विकल्प
जस्टिस जोसेफ का संदेश साफ और आक्रामक है। उन्होंने कहा कि आजकल संवैधानिक मामलों में निष्पक्ष होने के बजाय निजी राय को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। संस्थाओं की विश्वसनीयता पर से उठता विश्वास ही वजह है कि लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। नागरिकों का यह मौलिक कर्तव्य है कि जब हालात बिगड़ें, तो वे जानकारी के साथ और सभ्य तरीके से विरोध दर्ज कराएं।
वर्तमान में देशभर में चल रहे प्रदर्शनों और संस्थागत विश्वसनीयता के संकट के बीच जस्टिस कुरियन जोसेफ का यह बयान एक बार फिर याद दिलाता है कि संविधान की रक्षा के लिए वॉचडॉग को सिर्फ भौंकना नहीं, जरूरत पड़ने पर काटना भी सीखना होगा। अगर उच्च संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटती रहीं, तो लोकतंत्र की रक्षा का बोझ आम नागरिकों के कंधों पर आ जाएगा।














