बिलासपुर। पिता के कथित बकाया वेतन की मांग को लेकर तीन दशक से ज्यादा समय बाद हाईकोर्ट पहुंचे बेटे को राहत नहीं मिली। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 1989 से 1994 के बीच के कथित वेतन बकाया के भुगतान की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल करने की कोई तय समयसीमा नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई व्यक्ति बिना उचित कारण के दशकों तक अपने अधिकारों के लिए कार्रवाई न करे और फिर अदालत से राहत मांगने पहुंच जाए।

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने 6 अक्टूबर को देरी और निष्क्रियता के आधार पर याचिका शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दी।

1996 में आवेदन देने का दावा, लेकिन सबूत नहीं

याचिकाकर्ता ने खुद को साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) के दिवंगत कर्मचारी का बेटा बताते हुए कंपनी के अधिकारियों को उसके पिता के कथित बकाया वेतन पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की थी। उसका दावा था कि पिता ने 2 जनवरी 1996 को आवेदन देकर 1989 से 1994 के बीच के बकाया भुगतान की मांग की थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई रिसीविंग, पावती या अन्य दस्तावेज नहीं है, जिससे साबित हो सके कि आवेदन संबंधित अधिकारी को सौंपा गया था।

पिता की मौत के बाद भी नहीं हुई प्रभावी पहल

कोर्ट के मुताबिक, संबंधित कर्मचारी वर्ष 2002 में रिटायर हुए थे और 2015 में उनकी मौत हो गई। उनके जीवित रहते भी कथित बकाया भुगतान के लिए कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। पिता की मौत के बाद बेटे ने भी लंबे समय तक इस मांग को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं की।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह स्पष्ट नहीं कर सका कि कथित बकाया राशि के लिए तीन दशक से अधिक समय तक इंतजार क्यों किया गया। देरी को उचित ठहराने वाला कोई ठोस कारण या असाधारण परिस्थिति भी सामने नहीं रखी गई।

‘अपने अधिकार पर सोने वाले को नुकसान उठाना पड़ता है’

जस्टिस गुरु ने टिप्पणी की कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के असाधारण और विवेकाधीन अधिकार क्षेत्र में आने वाले व्यक्ति को उचित सतर्कता बरतनी चाहिए और वाजिब समय के भीतर अदालत पहुंचना चाहिए। इस अधिकार का इस्तेमाल लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद पुराने दावों को दोबारा जीवित करने के लिए नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपनी मर्जी से सोता रहा और जब चाहा, तब जागकर अदालत पहुंच गया। उसके इंतजार की वजह वही जानता होगा, लेकिन कानून इस तरह के तर्क को स्वीकार नहीं करता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति अपने अधिकारों को लेकर लंबे समय तक निष्क्रिय रहता है, उसे उसका नुकसान उठाना पड़ता है।

याचिका में भी मिली विसंगति

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के दावों में विरोधाभास भी पाया। याचिका में उसके पिता को सहायक शिक्षक बताया गया था, जबकि 1996 के कथित आवेदन में पद का उल्लेख चपरासी, श्रेणी-दो के रूप में किया गया था।

कोर्ट ने कहा कि इतने पुराने दावे पर विचार करने से अन्य पक्षों के अधिकार और हित प्रभावित हो सकते हैं। देरी और निष्क्रियता के सिद्धांत का उद्देश्य मामलों में स्थिरता और अंतिमता बनाए रखना है।

समयसीमा तय नहीं, फिर भी उचित समय में याचिका जरूरी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल करने के लिए कानून में कोई निश्चित परिसीमा अवधि निर्धारित नहीं है। इसके बावजूद सामान्य नियम यही है कि याचिका उचित समय के भीतर दायर की जानी चाहिए।

चूंकि याचिकाकर्ता कथित 1996 के आवेदन को साबित नहीं कर सका और दशकों की देरी का संतोषजनक कारण भी नहीं बता पाया, इसलिए कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

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