अदालत की टिप्पणी- परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को बिना ठोस साक्ष्य के चुनौती नहीं दी जा सकती, शिकायत निवारण व्यवस्था अपनाना भी जरूरी
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने NEET (UG)-2026 की ओएमआर (OMR) उत्तरपुस्तिका में कथित छेड़छाड़ के आरोप लगाने वाले एक अभ्यर्थी की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि आधिकारिक परीक्षा रिकॉर्ड में छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोप केवल आशंका, अनुमान या व्यक्तिगत विश्वास के आधार पर स्वीकार नहीं किए जा सकते। ऐसे मामलों में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना आवश्यक है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि यदि केवल किसी अभ्यर्थी की शंका के आधार पर मूल्यांकन प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप किया जाए, तो इससे परीक्षा प्रणाली की निश्चितता, पवित्रता और अंतिमता प्रभावित होगी।
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) द्वारा वेबसाइट पर उपलब्ध कराई गई स्कैन की गई ओएमआर शीट डाउनलोड करने पर उसने पाया कि बुकलेट नंबर, रोल नंबर और हस्ताक्षर तो उसके ही हैं, लेकिन कई उत्तर उन उत्तरों से अलग हैं जिन्हें उसने परीक्षा में भरा था। उसका आरोप था कि मूल ओएमआर शीट में छेड़छाड़ की गई, जिसके कारण उसे 600 से अधिक अंक मिलने के बजाय केवल 200 अंक प्राप्त हुए।
याचिका में यह भी कहा गया कि स्कैन की गई ओएमआर शीट में कई स्थानों पर स्याही के निशान गोले (OMR सर्किल) से बाहर तक दिखाई दे रहे हैं, जबकि वह सामान्य रूप से इस तरह उत्तर नहीं भरता। उसने दावा किया कि इस विसंगति की जानकारी मिलने के बाद उसने ई-मेल के माध्यम से संबंधित अधिकारियों से मूल ओएमआर शीट उपलब्ध कराने का अनुरोध किया, लेकिन उसे उपलब्ध नहीं कराया गया।
दूसरी ओर, एनटीए और अन्य संबंधित अधिकारियों ने अदालत को बताया कि परीक्षा से जुड़े विवादों के समाधान के लिए निर्धारित शिकायत निवारण तंत्र उपलब्ध है, लेकिन याचिकाकर्ता ने उसका उपयोग किए बिना सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना था कि प्रश्नपत्र, उत्तर कुंजी, ओएमआर शीट और मूल्यांकन संबंधी शिकायतों के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के आरोप केवल उसके स्वयं तैयार किए गए तुलना चार्ट और स्कैन की गई ओएमआर शीट की व्यक्तिगत तुलना पर आधारित हैं। अदालत ने कहा कि ऐसा कोई स्वतंत्र, विश्वसनीय या ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि मूल ओएमआर शीट और स्कैन की गई प्रति में अंतर है या परीक्षा प्राधिकरण ने किसी प्रकार की छेड़छाड़ की है।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि जब तक यह साबित न हो कि शिकायत निवारण का वैकल्पिक तंत्र उपलब्ध नहीं था या प्रभावी नहीं था, तब तक उसे दरकिनार कर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सीधे न्यायालय में तथ्यात्मक विवाद का निपटारा नहीं कराया जा सकता।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता मूल्यांकन प्रक्रिया में किसी प्रकार की मनमानी, अवैधता, दुर्भावना या प्रक्रियागत त्रुटि साबित करने में असफल रहा है। इसी आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया।














