भ्रष्टाचार मामले में दोषसिद्धि के आधार पर हुई थी बर्खास्तगी, अदालत ने कहा-  पुराने कानूनी परिणाम स्वतः समाप्त नहीं होते

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में बाद में बरी कर दिए जाने मात्र से उसे नौकरी से बाहर रहने की अवधि का वेतन पाने का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने राज्य विद्युत वितरण कंपनी के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी की अपील खारिज करते हुए कहा कि जब बर्खास्तगी का आदेश उस समय की वैध दोषसिद्धि के आधार पर पारित किया गया था, तब नियोक्ता की कार्रवाई कानूनसम्मत थी।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने राम प्रसाद नायक द्वारा दायर रिट अपील को निरस्त करते हुए यह निर्णय दिया। अदालत ने माना कि सेवा से बाहर रहने की अवधि के लिए बकाया वेतन (बैक वेजेस) की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

1977 में शुरू हुई नौकरी, भ्रष्टाचार मामले में हुई थी सजा

रिकॉर्ड के अनुसार राम प्रसाद नायक ने वर्ष 1977 में विद्युत मंडल में सेवा प्रारंभ की थी और बाद में सिविल सुपरवाइजर के पद तक पहुंचे। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज हुआ था। विशेष न्यायालय ने दिसंबर 2012 में उन्हें दोषी ठहराया, जिसके बाद विभाग ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया।

नायक ने इस दोषसिद्धि को हाईकोर्ट में चुनौती दी। आपराधिक अपील लंबित रहने के दौरान अगस्त 2018 में वे सेवानिवृत्त हो गए। बाद में मई 2020 में हाईकोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि निरस्त करते हुए उन्हें बरी कर दिया।

विभाग ने बहाल किए सेवा लाभ, लेकिन वेतन देने से किया इनकार

बरी होने के बाद बिजली वितरण कंपनी ने बर्खास्तगी आदेश वापस लेते हुए उन्हें सेवा संबंधी लाभों की सांकेतिक (नोटional) बहाली प्रदान की। हालांकि, बर्खास्तगी से लेकर सेवानिवृत्ति तक की अवधि का वास्तविक वेतन और बकाया भुगतान देने से इनकार कर दिया।

नायक की ओर से तर्क दिया गया कि उनकी बरी होना तकनीकी आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर हुई थी। इसलिए दोषसिद्धि समाप्त होने के बाद उन्हें पूर्ण रूप से निर्दोष माना जाना चाहिए और सेवा से बाहर रहने की अवधि का वेतन भी मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने क्यों ठुकराई मांग?

खंडपीठ ने कहा कि जब कर्मचारी को बर्खास्त किया गया था, तब उसके खिलाफ सक्षम आपराधिक न्यायालय का वैध दोषसिद्धि आदेश मौजूद था। इसलिए विभाग की कार्रवाई पूरी तरह वैध थी।

अदालत ने यह भी कहा कि बाद में हुई बरी होने से दोषसिद्धि के आधार पर पहले से उत्पन्न सभी कानूनी परिणाम स्वतः समाप्त नहीं हो जाते। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल दोषसिद्धि रद्द हो जाने से कर्मचारी बैक वेजेस का दावा अधिकारपूर्वक नहीं कर सकता।

न्यायालय ने “नो वर्क, नो पे” (काम नहीं तो वेतन नहीं) के सिद्धांत को भी लागू किया और कहा कि संबंधित अवधि में कर्मचारी ने कोई सेवा नहीं दी थी, इसलिए वेतन का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अपील पूरी तरह खारिज

अदालत ने एकलपीठ के पूर्व आदेश में कोई त्रुटि न पाते हुए अपील खारिज कर दी। साथ ही कहा कि मामले में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है और अपीलकर्ता सेवा से बाहर रहने की अवधि के वेतन का हकदार नहीं है।

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